कमलेश कुमार महावर| टोंक हरियालो राजस्थान अभियान के तहत टोंक जिले में इस साल भी वृहद पौधारोपण की तैयारियां जोरों पर हैं। वन विभाग की तरफ से जिले की 15 नर्सरियों में 14.80 लाख से ज्यादा पौधे तैयार किए जा रहे हैं। कार्यवाहक उपवन संरक्षक (एसीएफ) अनुराग महर्षि ने बताया कि 15 जून के बाद मानसून की शुरुआत के साथ ही पौधारोपण अभियान तेज होगा और आमजन को पौधों का वितरण भी किया जाएगा। महर्षि ने बताया कि जिला मुख्यालय पर जखीरा, फुलबाग के अलावा देवड़ावास व जिले की अन्य नर्सरियों में इस बार भी छायादार, फलदार और फूलदार पौधों की विभिन्न प्रजातियां तैयार की जा रही हैं, जिनमें नीम, पीपल, शीशम, बड़, अमलतास, करंज, गुलमोहर, आम, जामुन, आंवला जैसे पौधे प्रमुख हैं। इन प्रजातियों का चयन स्थानीय जलवायु, मिट्टी और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर किया गया है, ताकि पौधारोपण के बाद उनकी जीवित रहने की संभावना अधिक रहे। हालांकि विशेषज्ञ मानते है कि पौधे लगाने के साथ उनका सरंक्षण बहुत ज्यादा जरुरी है। क्योंकि पौधे लगाने के बाद उसे पेड़ बनाने तक की जिम्मेदारी उठानी चाहिए चाहिए और यह काम सिर्फ वन विभाग नही, बल्कि जनसहभागिता भी जरुरी है। महर्षि ने बताया कि हरियालो राजस्थान” अभियान के तहत जिले की यह पहल न केवल हरित क्षेत्र बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ पर्यावरण सुनिश्चित करने की ओर भी एक सार्थक प्रयास है। नर्सरियां यूं तैयार होते हैं पौधे : नर्सरियों में पौधे तैयार करने की प्रक्रिया वैज्ञानिक और व्यवस्थित होती है। सबसे पहले उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन कर उन्हें मिट्टी, रेत और जैविक खाद के मिश्रण में बोया जाता है। अंकुरण के बाद छोटे पौधों को पॉलीबैग या ट्रे में स्थानांतरित किया जाता है, जहां उन्हें पर्याप्त पोषण और सुरक्षा मिलती है। उनकी अच्छी वृद्धि के लिए नियमित सिंचाई, निराई-गुड़ाई और रोग-कीट नियंत्रण किया जाता है। गर्मी में तेज धूप से बचाने के लिए शेड नेट का उपयोग होता है, जबकि मानसून में जलभराव रोकने के उपाय किए जाते हैं। समय-समय पर जैविक खाद व पोषक तत्व देकर तथा हार्डनिंग प्रक्रिया अपनाकर पौधों को मजबूत और बाहरी वातावरण के अनुकूल बनाया जाता है।
^पौधे लगाने के बाद ज्यादातर हम यह सोचते है, हमारा खत्म हो गया, जबकि पौधा लगाने का बाद हमारा काम शुरु होता है, जब तक उसको सरंक्षण व सुरक्षा नही देते है, क्योंकि जब तक पौधा पेड नही बनता, जब तक उसका उपयोग नही है। टोंक जिले के वनक्षेत्र की भी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए है, वन विभाग अपनी तरफ से इसके लिए काम करता है, लेकिन जन सहभागिता बहुत जरुरी है, एक पौधा मां के नाम से लोगों में पौधे लगाने के प्रति जागरुकता आई लेकिन उसका सुरक्षा को लेकर भी आमजन को जागरुक होना चाहिए। दीपचंद बैरवा, पूर्व डीएफओ, टोंक। हर साल बड़े पैमाने पर पौधारोपण होने के बावजूद पौधों के जीवित रहने की दर चिंता का विषय है। शुष्क जलवायु, सुरक्षा के अपर्याप्त इंतजाम और जनसहभागिता की कमी के चलते 50 प्रतिशत से भी कम पौधे बच पाते हैं, जबकि कई जानकार इसे महज 30-30 प्रतिशत तक मानते हैं। पिछले 16 सालों में 50 लाख से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं, इस साल वन विभाग ने 1100 हेक्टेयर क्षेत्र में प्लांटेशन के साथ करीब 14.80 लाख पौधों की तैयारी की है। विभाग ने प्रयास तेज किए हैं, लेकिन बेहतर सफलता के लिए आमजन की सक्रिय भागीदारी और पौधों की देखभाल को जरूरी माना जा रहा है।