कोटा के जेके लोन अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की मौत के मामलों ने प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इसी बीच भरतपुर में जननी सुरक्षा योजना के तहत संचालित एंबुलेंस सेवाओं की हकीकत भी चौंकाने वाली सामने आई है। गंभीर गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं और नवजातों को जयपुर रेफर करने के लिए उपयोग में लाई जा रही एंबुलेंसों में जरूरी जीवनरक्षक उपकरण तक उपलब्ध नहीं हैं। दैनिक भास्कर की पड़ताल में कॉन्ट्रैक्ट पर संचालित दोनों एंबुलेंसों में गंभीर खामियां मिलीं। एक एंबुलेंस में केवल खाली ढांचा दिखाई दिया, जबकि दूसरी में सिर्फ ऑक्सीजन सिलेंडर रखा मिला। सिलेंडर के साथ फ्लोमीटर और मास्क मौजूद नहीं थे। मरीज मॉनिटरिंग सिस्टम, वेंटिलेटर, बीपी मॉनिटर, इमरजेंसी दवाइयां और डिलीवरी किट जैसी जरूरी सुविधाएं भी नहीं मिलीं। ऐसे में रास्ते में मरीज की हालत बिगड़ने पर तत्काल उपचार संभव नहीं है। जनाना अस्पताल से हर महीने 15 से 20 गंभीर प्रसूताओं को करीब 180 किलोमीटर दूर जयपुर रेफर किया जाता है। कई बार रोजाना एक से अधिक मरीजों को भी रेफर करना पड़ता है। हाई रिस्क मरीजों को लंबे सफर के दौरान लगातार ऑक्सीजन सपोर्ट और मॉनिटरिंग की जरूरत होती है, लेकिन एंबुलेंसों में इसके अनुरूप व्यवस्थाएं नहीं मिलीं। वहीं एंबुलेंसों में गंभीर मरीजों के ट्रांसफर के लिए जरूरी उपकरण नहीं मिले। मॉनिटरिंग मशीन, वेंटिलेटर, फ्लोमीटर, बीपी मॉनिटर और इमरजेंसी मेडिकल किट जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। हर रेफरल पर 3200 रुपए, फिर भी व्यवस्था अधूरी स्वास्थ्य विभाग की गाइडलाइन के अनुसार गंभीर मरीजों को ले जाने वाली एंबुलेंस में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम, मॉनिटरिंग उपकरण और प्रशिक्षित स्टाफ होना जरूरी है। इसके बावजूद प्रत्येक रेफरल पर एंबुलेंस ठेकेदार को करीब 3200 रुपए का भुगतान किया जा रहा है। “आरबीएम का ऑक्सीजन प्लांट चालू हो गया है। वहीं, जननी सुरक्षा के तहत चलने वाली ठेके पर दी एंबुलेंस में कमी है तो उसका निरीक्षण करा लेंगे।” -डॉ. नागेंद्र भदौरिया, पीएमओ ( आरबीएम)