बीकानेर के सामाजिक, राजनीतिक और विधिक परिदृश्य के एक मजबूत स्तंभ, वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व विधायक राम कृष्ण दास गुप्ता का मंगलवार (27 अक्टूबर) को सुबह 9 बजे हल्दीराम मूलचंद अस्पताल में हृदयाघात से निधन हो गया। वे 84 वर्ष के थे तथा लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। स्व. गुप्ता की अंतिम यात्रा सादुल कॉलोनी स्थित उनके निवास से रानी बाजार परदेसियों की बगीची मुक्तिधाम तक गई, जहां उनकी देह पंचतत्व में विलीन हो गई। उनके भतीजे रिटायर्ड मेजर जनरल संजय गुप्ता ने उन्हें मुखाग्नि दी। छात्र जीवन से ही जनसमस्याओं के प्रति सजग रहने वाले गुप्ता बीकानेर के रेल आंदोलनों के प्रणेता रहे। निष्ठा, सिद्धांतों और जनसेवा से भरा उनका पूरा जीवन हर किसी के लिए अनुकरणीय रहेगा। अविवाहित रहकर अपना संपूर्ण जीवन जनता और अधिवक्ताओं को समर्पित करने वाले राम कृष्ण दास गुप्ता के निधन से बीकानेर में जनसंघर्ष और मूल्यों के एक युग का अंत हो गया है। उनके अचानक चले जाने से न केवल अधिवक्ता समुदाय, बल्कि पूरा शहर शोकाकुल है। एडवोकेट एक्ट लागू, बढ़ी हुई स्टांप ड्यूटी कम कराई स्व. गुप्ता की देश के वकीलों के लिए यह सबसे बड़ी देन है। वर्ष 2001-02 में राजस्थान बार काउंसिल के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की जोधपुर में बैठक बुलाई। उद्देश्य देशभर में एडवोकेट एक्ट की धारा 32 को लागू कराना था। केंद्र को इसके लिए प्रस्ताव भेजा गया, जिसके बाद यह एक्ट लागू हुआ। इसी के बाद वकीलों को अदालतों में ‘एज एडवोकेट’ वकालतनामा पेश करने का अधिकार मिला। नया न्यायालय भवन भी उन्हीं के संघर्ष की देन है। 1987 में बढ़ी हुई स्टांप ड्यूटी को वापस लेने के लिए उन्होंने सरकार को मजबूर कर दिया था और एसआर ऑफिस का ताला तीन दिन तक नहीं खुलने दिया था। - जैसा कि एडवोकेट सत्यपाल साहू ने बताया हावड़ा ट्रेन चलवाई, बायपास के लिए आंदोलन स्व. गुप्ता बीकानेर में सबसे बड़े रेल आंदोलन के प्रणेता थे। बीकानेर-हावड़ा ट्रेन और रेल बायपास के लिए उन्होंने लगातार दो साल तक कोटगेट पर धरना दिया। गुप्ता ने 32 बार ट्रेनें रोकीं। वे एक सप्ताह तक जेल में रहे, लेकिन घर के खाने के बजाय साथियों के साथ जेल का ही खाना खाया। करीब साढ़े आठ माह के कड़े संघर्ष के बाद हावड़ा ट्रेन की मंजूरी मिली (यह ट्रेन आज भी आधी जोधपुर और आधी बीकानेर से चलती है)। रेल बायपास के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री भैंरोसिंह शेखावत और केंद्रीय रेल मंत्री सी.के. जाफर शरीफ की मौजूदगी में सैद्धांतिक सहमति बनी थी। स्व. गुप्ता ने अंतिम सांस तक यह लड़ाई लड़ी है। - जैसा कि संपत पारीक ने बताया सफील की सुरक्षा के लिए लड़े, स्टे लाए स्व. गुप्ता जनसमस्याओं के लिए हमेशा संघर्षरत रहे। राजीव गांधी मार्ग उन्हीं के संघर्ष की देन है। यूआईटी शहर की प्राचीन सफील पर दुकानें आवंटित कर रही थी। शिलान्यास/उद्घाटन समारोह चल ही रहा था कि अचानक गुप्ता मंच पर चढ़े और माइक तोड़ फेंका। वहां काफी हंगामा हुआ। इसके बाद उन्होंने कोर्ट में मेरे नाम से वाद दायर किया और निर्माण पर स्टे लेकर आए। इसी प्रकार पीबीएम अस्पताल रोड पर दुकानों को सड़क से 20 फीट पीछे करवाया और इसके लिए भी कोर्ट की शरण ली। उनका आंदोलन (मूवमेंट) अचानक होता था और उसकी रणनीति के बारे में सिर्फ वही जानते थे। - जैसा कि एडवोकेट विवेक शर्मा ने बताया सिद्धांतों से कभी नहीं किया समझौता डॉक्टर परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद उन्होंने वकालत और समाजसेवा को चुना। स्वतंत्रता सेनानी रघुवर प्रसाद गोयल के शिष्य गुप्ता 1977 में कोलायत से जनता पार्टी के विधायक चुने गए, लेकिन नीतिगत विरोध के चलते इस्तीफा दे दिया। आपातकाल के दौरान वे करीब 18 माह जेल में रहे और किसी भी शर्त पर रिहाई से इनकार कर दिया। जीवनभर निष्ठा का परिचय देते हुए उन्होंने पूर्व विधायक के रूप में मिलने वाली पेंशन और मीसा बंदी के भत्ते तक को ठुकरा दिया। अधिवक्ता समाज के भीष्म पितामह : बार एसोसिएशन, बीकानेर के लगभग 8 से 10 बार अध्यक्ष रहे गुप्ता बीकानेर संभाग से राजस्थान बार काउंसिल के चेयरमैन बनने वाले प्रथम अधिवक्ता थे। बीकानेर के नए कोर्ट परिसर के निर्माण, फराशखाने की जमीन आवंटन, राजस्थान कोर्ट फीस एक्ट आंदोलन का प्रादेशिक नेतृत्व और हाईकोर्ट बेंच की स्थापना के लिए वे जीवन के अंतिम दिनों तक संघर्षरत रहे।