हार्ट की आर्टरी में ब्लॉकेज होने पर मरीज को स्टेंट की जरूरत है या दवाओं से ही इलाज संभव है। इसका फैसला अब आधुनिक तकनीक की मदद से अधिक सटीकता के साथ किया जा सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित नई जनरेशन की ''आइवस तकनीक'' एंजियोप्लास्टी के दौरान ब्लॉकेज की स्थिति, स्टेंट की लंबाई और उसके सही तरीके से खुलने से जुड़ी जानकारी देने में मदद करती है। वहीं एफएफआर जांच से यह पता लगाया जा सकेगा कि ब्लॉकेज के कारण ब्लड फ्लो कितना प्रभावित हो रहा है और मरीज को स्टेंट की जरूरत है या नहीं। शहर में इंटरनेशनल हार्ट कॉन्क्लेव में विशेषज्ञों ने इन नई तकनीकों और हार्ट के इलाज में उनकी भूमिका पर चर्चा की। कोर्स डायरेक्टर डॉ. संजीव शर्मा ने बताया- अमेरिका के माउंट सिनाई हॉस्पिटल के सहयोग से आयोजित इस कॉन्क्लेव में देश-विदेश से आए डॉक्टरों ने हृदय रोगों की पहचान, जोखिम और इलाज की आधुनिक तकनीकों पर चर्चा की। कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. समीन शर्मा ने कैल्सिफाइड ब्लॉकेज में सही इलाज का विकल्प चुनने पर रिसर्च प्रस्तुत की। वहीं डॉ. जितेंद्र मक्कड़ ने बताया- पहले दिन क्लिनिकल कार्डियोलॉजी के सत्र में अमेरिका के डॉ. रॉबर्ट एस. रोसेन्सन ने एलपीए विषय पर चर्चा की। एंजियोप्लास्टी में मिलेगी आर्टरी की अंदरूनी जानकारी डॉ. समीर मेहता ने बताया- नई जनरेशन की आइवस (इंट्रावैस्कुलर अल्ट्रासाउंड) तकनीक में अल्ट्रासाउंड की मदद से आर्टरी के अंदर की स्थिति का आंकलन किया जाता है। इससे ब्लॉकेज की संरचना, प्लाक में मौजूद कोलेस्ट्रॉल और स्टेंट के लिए जरूरी लंबाई और आकार तय करने में मदद मिलती है। एंजियोप्लास्टी के दौरान मिलने वाली यह जानकारी डॉक्टर को स्टेंट सही तरीके से लगाने और उसके पर्याप्त रूप से खुलने का आंकलन करने में सहायक होती है। इससे स्टेंट के कम खुलने और दोबारा ब्लॉकेज जैसी जटिलताओं का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। एफएफआर से तय होगा स्टेंट जरूरी या दवा पर्याप्त डॉ. संजीव शर्मा ने बताया- एफएफआर (फ्रैक्शनल फ्लो रिजर्व) जांच में विशेष सेंसर वाली गाइड वायर की मदद से ब्लॉकेज के पहले और बाद में रक्त प्रवाह पर पड़ने वाले दबाव के अंतर का आंकलन किया जाता है। इससे पता चलता है कि ब्लॉकेज हृदय की मांसपेशियों तक रक्त पहुंचने में कितनी बाधा डाल रहा है। सामान्य तौर पर एफएफआर का मान 0.80 या इससे कम होने पर स्टेंट लगाने पर विचार किया जाता है।