जयपुर के जवाहर कला केंद्र (JKK) में इस बार 29वें लोकरंग समारोह में राजस्थान की लोक संस्कृति और शौर्य की अनूठी झलक देखने को मिलेगी। 27 अक्टूबर से शुरू होने वाले समारोह में पहली बार लोक कलाकार अंगारों पर नृत्य करते नजर आएंगे। इसके साथ ही तेजा गायन भी आकर्षण का खास केंद्र रहेगा। दरअसल, समारोह में पहली बार जसनाथी संप्रदाय के प्रसिद्ध अग्नि नृत्य की प्रस्तुति होगी। इसमें लोक कलाकार धधकते अंगारों पर नृत्य करते नजर आएंगे। राजस्थान के बीकानेर जिले के कतरियासर गांव से जुड़ी इस प्राचीन परंपरा को लोक आस्था और साधना का प्रतीक माना जाता है। अग्नि नृत्य के साथ इस बार राजस्थान की लोक परंपरा का अहम हिस्सा रहे तेजाजी से जुड़े तेजा गायन की प्रस्तुति भी होगी। जवाहर कला केंद्र में 27 अक्टूबर से राष्ट्रीय लोक नृत्य उत्सव की शुरुआत होगी। इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों के लोक कलाकार अपनी पारंपरिक प्रस्तुतियों के माध्यम से सांस्कृतिक विविधता को सामने लाएंगे। राजस्थान के सैकड़ों कलाकार भी अलग-अलग लोक नृत्यों और लोक विधाओं की प्रस्तुतियां देंगे। समारोह के दौरान शिल्पग्राम में हस्तशिल्प मेला भी आयोजित किया जाएगा, जहां पारंपरिक शिल्प और हस्तनिर्मित उत्पादों को देखने का अवसर मिलेगा। आयोजन को भव्य रूप देने के लिए इस बार इवेंट कंपनी को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। पूरे आयोजन पर सवा दो करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होने का अनुमान है, जबकि इवेंट कंपनी के लिए टेंडर लगभग 90 लाख रुपए का है। पहली बार लोकरंग में दिखेगा अग्नि नृत्य का रोमांच लोकरंग समारोह में इस बार अग्नि नृत्य प्रमुख आकर्षण रहेगा। जवाहर कला केंद्र के अतिरिक्त महानिदेशक गोपाल राम बिरदा ने बताया कि समारोह में पहली बार इस नृत्य की प्रस्तुति करवाई जाएगी। अग्नि नृत्य राजस्थान की उन विशिष्ट लोक परंपराओं में शामिल है, जिनमें आस्था, साधना, शारीरिक कौशल और सामूहिक विश्वास का अनूठा संगम दिखाई देता है। जसनाथी संप्रदाय से जुड़े इस नृत्य में सिद्ध कलाकार धधकते अंगारों के बीच अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। दर्शकों के लिए यह प्रस्तुति रोमांचक होने के साथ राजस्थान की लोक परंपराओं को करीब से जानने का अवसर भी होगी। इस नृत्य के जरिए लोकरंग में प्रदेश की ऐसी सांस्कृतिक विरासत सामने आएगी, जो पीढ़ियों से परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ती रही है। कतरियासर गांव से जुड़ी है अग्नि नृत्य की परंपरा अग्नि नृत्य का उद्गम बीकानेर जिले के कतरियासर गांव से माना जाता है। इसी गांव में संत जसनाथ जी का समाधि स्थल है और यह स्थान जसनाथी संप्रदाय की परंपराओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस नृत्य का आयोजन धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक विधियों के अनुरूप किया जाता है। नृत्य से पहले लकड़ियां जलाकर अंगारों का बड़ा ढेर तैयार किया जाता है, जिसे ‘धुना’ कहा जाता है। इसके लिए आमतौर पर खेजड़ी या फोग की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। अंगारों के धधकने के बाद सिद्ध कलाकार गुरु को प्रणाम करते हैं और ‘फतह-फतह’ का उद्घोष करते हुए अग्नि के बीच प्रवेश करते हैं। इसके बाद वे अंगारों पर नृत्य करते हुए विभिन्न पारंपरिक क्रियाओं का प्रदर्शन करते हैं। अंगारों पर मतीरा फोड़ने से हल जोतने तक की क्रियाएं अग्नि नृत्य की खासियत केवल जलते अंगारों पर चलना या नृत्य करना नहीं है, बल्कि इसके दौरान कलाकारों की ओर से प्रदर्शित की जाने वाली पारंपरिक क्रियाएं भी हैं। नर्तक अंगारों पर मतीरा फोड़ने और हल जोतने जैसी क्रियाएं सहजता से करते हैं। इन प्रस्तुतियों में लोक जीवन, ग्रामीण परिवेश और परंपरागत मान्यताओं की झलक दिखाई देती है। यह नृत्य ढोल, नगाड़े और मंजीरे की धुन पर किया जाता है। जैसे-जैसे संगीत की लय तेज होती है, नृत्य की गति भी बढ़ती जाती है। वाद्ययंत्रों की गूंज, कलाकारों की लयबद्ध गतिविधियां और धधकते अंगारों का दृश्य इस प्रस्तुति को विशिष्ट बनाते हैं। अग्नि नृत्य राजस्थान की उन लोक विधाओं में शामिल है, जिनमें कला के साथ आस्था और साधना का गहरा संबंध दिखाई देता है। इस प्राचीन परंपरा को संरक्षण और प्रसिद्धि दिलाने में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह का भी महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उनके संरक्षण से इस नृत्य को व्यापक पहचान मिली और यह राजस्थान की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में सामने आया। तेजा गायन से भी रूबरू होंगे दर्शक इस बार लोकरंग में राजस्थान की लोक संस्कृति के एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाने के लिए तेजा गायन भी आयोजित किया जाएगा। लोकदेवता वीर तेजाजी से जुड़ी लोकगाथाएं राजस्थान के ग्रामीण जीवन, लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का अहम हिस्सा हैं। तेजा गायन के माध्यम से दर्शकों को लोकदेवता से जुड़े प्रसंगों और पारंपरिक गायन शैली को सुनने का अवसर मिलेगा। अग्नि नृत्य और तेजा गायन जैसी प्रस्तुतियां लोकरंग को केवल लोक नृत्यों का मंच बनाने के बजाय राजस्थान की विविध लोक परंपराओं को एक साथ सामने लाने वाला आयोजन बनाएंगी। इससे नई पीढ़ी को प्रदेश की मौखिक परंपराओं, लोक मान्यताओं और पारंपरिक कलाओं से परिचित होने का अवसर भी मिलेगा।