जैसलमेर के 9 साल पुराने 'ब्रायस फोर्ट' होटल विवाद में पुलिस ने दिल्ली से 39 करोड़ रुपए के धोखाधड़ी करने, फर्जी दस्तावेज बनाने और गबन के आरोपी हरेंद्र सिंह खोखर को गिरफ्तार किया है। मामला 2018 में कोतवाली थाने का है। ब्रायस ग्रुप की प्रमोटर डायरेक्टर नवनीत गौड़ का आरोप है कि जब उन्होंने जैसलमेर कोतवाली थाने में मामला दर्ज कराया था। तब पुलिस ने उनकी फाइल ही गायब कर दी थी। इसके बाद तत्कालीन डीजीपी (DGP) से गुहार लगाने पर सीबी-सीआईडी (CB-CID) ने मामले की नए सिरे से जांच शुरू की और आरोपी को पकड़ा है। आरोपी को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में 28 जुलाई को पेश किया गया। जहां उसकी जमानत याचिका खारिज करके जेल भेज दिया गया। अब समझिए पूरा मामला ब्रायस ग्रुप की प्रमोटर डायरेक्टर नवनीत गौड़ के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में उनका समूह पिछले 30 सालों से रियल एस्टेट और होटल का काम कर रहा है। उन्होंने जैसलमेर का ब्रायस फोर्ट होटल साल 2010 में 13 करोड़ रुपए में खरीदा था। इसके बाद में इसमें 93 कमरों का बड़ा होटल बनाया गया। जिसके लिए बैंक ऑफ बड़ौदा की दिल्ली ब्रांच से 31 करोड़ रुपए का लोन लिया था। साल 2015-16 में रियल एस्टेट में मंदी आने के बाद मुलाकात दिल्ली निवासी हरेंद्र सिंह खोखर से हुई। सितंबर 2016 में हरेंद्र के साथ 39 करोड़ रुपए में एक समझौता (MOU) हुआ। शर्त के मुताबिक हरेंद्र को होटल का संचालन संभालना था और बैंक का लोन चुकाना था। आरोपी ने रुपयों को अन्य खातों में ट्रांसफर किए नवनीत गौड़ ने बताया- हरेंद्र ने होटल पर कब्जा तो कर लिया, लेकिन उससे होने वाली कमाई को बैंक खाते में जमा कराने के बजाय अन्य खातों में ट्रांसफर कर लिया था। नवनीत कौर ने आगे बताया कि हरेंद्र ने भ्रम में रखने के लिए करीब 9 करोड़ रुपए बैंक में जमा भी कराए थे, लेकिन वह कुल लोन चुकाने के लिए काफी नहीं थे। लोन नहीं चुकाने पर बैंक ने 2024 में समूह की दो बड़ी संपत्तियों जैसलमेर का ब्रायस फोर्ट और दिल्ली का ब्रायस इलन होटल को केवल 67 करोड़ रुपए में नीलाम कर दिया। जबकि इन दोनों की बाजार में कीमत करीब 250 करोड़ रुपए थी। अदालत ने आरोपी को जमानत देने से इनकार किया वकील हेमसिंह राठौड ने बताया- मामले में पुलिस ने विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया है। दूसरी ओर, बचाव पक्ष का तर्क है कि यह मामला केवल दो व्यावसायिक साझेदारों के बीच लेन-देन से जुड़ा सिविल विवाद है, न कि कोई आपराधिक मामला है। उनका यह भी कहना है कि FIR काफी पुरानी है और आरोपी ने जांच में सहयोग किया है। हालांकि, कोर्ट ने उपलब्ध केस डायरी और सबूतों को देखते हुए कहा कि फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर धोखाधड़ी करने का यह मामला प्रथम दृष्टया केवल सिविल विवाद नहीं लगता। अपराध की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया।