जयपुर में जलमहल की पाल पर रविवार शाम को मादा सॉफ्टशेल कछुए की प्राकृतिक गतिविधि का एक दुर्लभ नजारा देखने को मिला। सॉफ्टशेल कछुआ प्रजनन के लिए पानी के किनारे पहुंची और प्राकृतिक रूप से अंडे देने का प्रयास किया। ऐसे में हेल्प एंड सर्व ट्रस्ट की हेल्पलाइन पर कछुए के घायल होने की सूचना मिली थी। इसके बाद ट्रस्ट की रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची। जांच के दौरान टीम को कछुआ स्वस्थ और सक्रिय दिखाई दिया। टीम ने सावधानी बरतते हुए कछुए की प्राकृतिक प्रजनन प्रक्रिया में किसी तरह का इंटरफेरेंस नहीं किया। हेल्प एंड सर्व ट्रस्ट के संरक्षक अजय यादव और निदेशक नीरज चतुर्वेदी ने बताया कि हेल्पलाइन पर सूचना मिलने के बाद रेस्क्यू टीम को तुरंत जलमहल की पाल पर भेजा गया था। प्रजनन के लिए पानी से बाहर आई थी मादा सॉफ्टशेल कछुआ हेल्प एंड सर्व टीम ने जलमहल की पाल पहुंचकर कछुए की स्थिति का निरीक्षण किया। इस दौरान पता चला कि वह मादा सॉफ्टशेल कछुआ है, जो प्रजनन प्रक्रिया के लिए पानी से बाहर आई थी। कछुआ स्वस्थ और सक्रिय नजर आने पर टीम ने उसे अनावश्यक रूप से छूने या उसकी गतिविधि में बाधा डालने के बजाय सुरक्षित दूरी से निगरानी करने का फैसला लिया। रेस्क्यू टीम ने अंडे देने तक निगरानी की रेस्क्यू टीम के सदस्यों ने अंडे देने की प्रक्रिया के दौरान विशेष सावधानी बरती। टीम ने कछुए को आसपास की गतिविधियों या मानवीय हस्तक्षेप से किसी तरह की परेशानी न हो इसका ध्यान रखा। टाम के सदस्य कछुए के वापस पानी में लौटने तक मौके पर मौजूद रहे और उसकी गतिविधियों पर नजर बनाए रखी। टीम के सदस्य किशन जांगिड़ ने बताया कि वन्यजीवों के प्रजनन के दौरान इस तरह की सावधानी जरुरत होती है क्योंकि अनावश्यक छेड़छाड़ उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। एक बार में 20 से 40 अंडे दे सकते हैं सॉफ्टशेल कछुए ट्रस्ट की रेस्क्यू टीम के सदस्य लखन साहू ने बताया कि सॉफ्टशेल कछुए सामान्यत एक बार में लगभग 20 से 40 अंडे दे सकते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में अंडों से बच्चों के निकलने में करीब दो से तीन महीने का समय लग सकता है। हालांकि, अंडों की संख्या और उनके विकसित होने की अवधि कछुए की प्रजाति और पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है। हेल्प एंड सर्व ट्रस्ट ने इस घटना के जरिए आमजन से वन्यजीव संरक्षण में सहयोग करने की अपील की है। ट्रस्ट के अनुसार, जलाशयों और उनके आसपास के क्षेत्रों में वन्यजीवों की प्राकृतिक गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं। ऐसे में लोगों को वन्यजीवों से उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए और उन्हें छूने, परेशान करने या उनकी गतिविधियों में बाधा डालने से बचना चाहिए। साथ ही, उनके प्राकृतिक आवास और प्रजनन स्थलों को सुरक्षित रखना भी जरूरी है।