अक्सर कहा जाता है कि इंसानियत का रिश्ता खून के रिश्तों से भी ऊपर होता है। झुंझुनूं जिले के मलसीसर तहसील के डाबड़ी-धीरसिंह गांव में एक ऐसी ही मानवीय संवेदना भरी मिसाल देखने को मिली, जहां एक परिवार ने न केवल लावारिस हिरन के बच्चे की जान बचाई, बल्कि उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह पाला। लेकिन आज, उसी हिरन को वन विभाग को सौंपते समय घर की महिलाओं की आंखें नम थीं। ​मौत के मुंह से खींचकर लाई थीं ममता ​करीब 3-4 महीने पहले की बात है, जब वार्ड नंबर 09 निवासी ग्यारसी देवी अपने खेत में जा रही थीं। रास्ते में उन्हें एक नन्हा हिरन का बच्चा लावारिस और बेहद कमजोर हालत में मिला। उसके आसपास उसकी मां का कहीं कोई पता नहीं था और आवारा कुत्तों के हमले का खतरा उस पर मंडरा रहा था। ग्यारसी देवी ने उस बेजुबान की तड़प देखी और उसे मरने के लिए नहीं छोड़ सकीं। वे उसे अपने घर ले आईं। ​घर का सदस्य बन गया था नन्हा हिरन ​ग्यारसी देवी और उनकी बेटी ने न सिर्फ उसे पनाह दी, बल्कि उसे दूध-पानी पिलाकर और प्यार देकर उसकी परवरिश की। धीरे-धीरे वह बच्चा घर के माहौल में पूरी तरह घुल-मिल गया। बच्चों ने उसे अपने साथ खिलाया और दिन-रात उसकी सुरक्षा का ध्यान रखा। 3-4 महीनों की कड़ी मेहनत और ममता का ही नतीजा था कि जो बच्चा मरणासन्न स्थिति में मिला था, वह आज पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित है। वन्यजीव अधिकारियों को सौंपा ​समय बीतने के साथ हिरन बड़ा हो रहा था। ग्यारसी देवी को अहसास हुआ कि वन्यजीव का सही स्थान जंगल ही है। वन्यजीव संरक्षण के हित में उन्होंने एक कठिन निर्णय लिया और हिरन को वन विभाग को सौंपने का फैसला किया। ​16 जुलाई 2026 को ग्यारसी देवी ने झुंझुनूं के उप वन संरक्षक के नाम एक पत्र लिखा। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि अब वे हिरन के बच्चे को अपनी देखरेख में लेकर उसके संरक्षण की जिम्मेदारी उठाएं। हालांकि, जब उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों को वह हिरन सौंपा, तो घर में मौजूद मां और बेटी के चेहरे पर मायूसी साफ देखी जा सकती थी। अपनों की तरह पाले गए इस बेजुबान से बिछड़ना उनके लिए किसी अपने को विदा करने जैसा ही था।