जोधपुर के मथुरादास माथुर हॉस्पिटल में कानों में सुनने की क्षमता जांचने के लिए आ रहे मरीजों को 8 महीने बाद का नंबर दिया जा रहा है। अस्पताल में एक ही मशीन और एक ऑपरेटर के कारण मरीज परेशान हो रहे हैं। कई जिलों के आ रहे मरीज और उनके परिजन रेफर होकर यहां आते हैं, लेकिन उन्हें इतने महीने की वेटिंग दी जाने से वे परेशान हैं। अस्पताल में BERA (Brainstem Evoked Response Audiometry) टेस्ट से मरीजों में कानों में सुनने की क्षमता जांची जाती है। सरकारी अस्पताल से मिला प्रमाणपत्र विकलांगता पेंशन और स्कूल एडमिशन के लिए जरूरी होता है। मरीजों ने प्रशासन से स्पेशल कैंप लगाकर वेटिंग खत्म करने की मांग की है। जोधपुर संभाग के सबसे बड़े हॉस्पिटल में महज एक मशीन पर इतने मरीजों का भार है। जोधपुर के इस हॉस्पिटल में दैनिक भास्कर डिजिटल टीम ने भी मौके पर पहुंचकर मरीजों के परिजनों से बात की तो उन्होंने अपनी पीड़ा बताई। मरीजों के परिजनों के अलावा कई ऐसे लोग भी मिले, जो न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं। उन्होंने इशारों में अपनी पीड़ा बताई। जन्मजात बहरेपन या सुनने की कमी की होती है जांच BERA (Brainstem Evoked Response Audiometry) टेस्ट बच्चों में जन्मजात बहरापन या सुनने की कमी का पता लगाता है। यह जांच सोते हुए की जाती है, जिसमें कान पर इलेक्ट्रोड लगाकर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया रिकॉर्ड की जाती है। सरकारी अस्पतालों से मिला प्रमाणपत्र विकलांगता पेंशन और स्कूल एडमिशन के लिए जरूरी होता है। कई जिलों से रेफर होकर आते हैं मरीज
मथुरादास माथुर हॉस्पिटल में बाड़मेर, जैसलमेर, बालोतरा, फलोदी, पाली, सांचौर, जालोर आदि जिलों से मरीज रेफर होकर आते हैं। इस वजह से जो मरीज कम सुनने या बहरेपन की समस्या से ग्रसित हैं, उन्हें इसके लिए आवश्यक सार्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए भी कई महीने की वेटिंग का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में एक ही मशीन और ऑपरेटर सामाजिक कार्यकर्ता रामकिशोर ने बताया- पीपाड़ शहर ब्लॉक में जो बच्चे हैं, उनके लिए मथुरादास माथुर हॉस्पिटल है। जहां एक ही मशीन है और एक ही ऑपरेटर है। इसकी वजह से 7 से 8 महीने की वेटिंग रहती है। यहां BERA टेस्ट की मशीन की संख्या और ऑपरेटर की संख्या बढ़ाए जाए। इससे मरीजों की समय पर जांच हो सके, क्योंकि यहां आने के बाद मरीजों को जो तारीख दी जाती है, यदि उस तारीख पर वो नहीं पहुंच पाता है या कोई काम हो जाता है तो उसे फिर से सात से आठ महीने तक इंतजार करना पड़ता है। सरकार को इस पर संज्ञान लेना चाहिए। ताकि हॉस्पिटल में चल रही सात से आठ महीने की वेटिंग खत्म हो सकें। मरीजों के परिजन बोले- 8 महीने बाद की मिली डेट बाड़मेर से रिडमलराम अपने पोते को लेकर हॉस्पिटल आए। रिडमलराम ने बताया- मेरे पोते को कम सुनाई देता है। इसके लिए सर्टिफिकेट बनवाना है। जब बाड़मेर के सरकारी हॉस्पिटल गए तो वहां से जोधपुर के मथुरादास माथुर हॉस्पिटल में रेफर कर दिया गया। बाड़मेर में इस जांच की मशीन ही नहीं है। जब यहां आए तो डाॅक्टरों ने 31 नवंबर की तारीख दी है। अस्पताल अधीक्षक बोले- रोज तीन-चार जांच ही हो पाती है हॉस्पिटल अधीक्षक डॉ. विकास राजपुरोहित ने बताया- मशीन के संचालन के लिए आउटसोर्स से ऑडियोलॉजिस्ट को रखा गया है। इसमें एक ही व्यक्ति है। आमतौर पर स्पीच थैरेपिस्ट बहुत मुश्किल से मिल पाते हैं। इसमें भी लिमिट है कि रोज तीन से चार जांच ही हो पाती है। खास बात ये है कि इसमें मरीज को नींद आनी बेहद जरूरी है। कई बार मरीज को नींद की दवाइयां देने के बाद भी मरीज सोता नहीं है तो BERA रिकॉर्डिंग ठीक से नहीं आ पाती है। कई सारे टेक्निकल इश्यूज भी होते हैं, जिसके चलते इस जांच में समय लगता है। इसी वजह से वेटिंग बढ़ रही है।