कार्तिक मास को भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना गया है। कार्तिक मास का समापन 24 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के साथ होगा। वैष्णव परंपरा में इसे दामोदर मास के नाम से भी जाना जाता है। इस पूरे महीने में स्नान, दान, व्रत, जप, ध्यान, तुलसी पूजन और दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है। विशेष रूप से देवालयों और शिवालयों में प्रतिदिन दीपदान करने की परंपरा श्रद्धालुओं के लिए आस्था और साधना का प्रमुख अंग है। ज्योतिर्विद पंडित महेश श्रीमाली के अनुसार, कार्तिक मास में भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी, भगवान शिव, भगवान गणेश, भगवान धन्वंतरि, सूर्यदेव, गोवर्धन पर्वत, छठ माता और भगवान कार्तिकेय की आराधना का विशेष महत्व है। पुराणों में इस मास को पुण्य अर्जित करने, आत्मशुद्धि, संयम और परोपकार के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। श्रद्धालु भगवान श्रीहरि विष्णु और भगवान शिव के समक्ष दीप अर्पित कर सुख-समृद्धि, शांति और कल्याण की कामना करते हैं। कार्तिक मास में मंदिर, शिवालय, तुलसी, आंवले के वृक्ष तथा नदी, सरोवर, कुएं और बावड़ी जैसे पवित्र स्थलों के समीप दीपदान करने की परंपरा है। संध्या के समय दीप प्रज्वलित करना इस मास की विशेष धार्मिक परंपराओं में शामिल है। मान्यता है कि दीपदान से सर्वतोमुखी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। दीपक की लौ अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और निराशा से आशा की ओर बढ़ने का संदेश देती है। कार्तिक मास में धार्मिक परंपराओं के अनुसार सात नियमों का पालन विशेष महत्व रखता है। 1. ब्रह्ममुहूर्त में स्नान : सुबह जल्दी उठकर स्नान करना, सूर्यदेव को अर्घ्य देना और दिन की शुरुआत ईश्वर के स्मरण से करना शुभ माना जाता है। 2. दीपदान: पूरे महीने देवालयों और शिवालयों में दीप प्रज्वलित करना, तुलसी के समीप दीपक जलाना तथा संध्या के समय भगवान की आराधना करना प्रमुख नियम है। 3. तुलसी पूजन : तुलसी को जल अर्पित करना, परिक्रमा करना और संध्या में दीप प्रज्वलित करना भगवान विष्णु की भक्ति से जुड़ी परंपरा है। 4. सात्त्विक भोजन: इस महीने में सात्त्विक भोजन, इंद्रिय संयम और ब्रह्मचर्य पालन पर जोर दिया जाता है। 5. जप और ध्यान : प्रतिदिन इष्टदेव के मंत्रों का जाप, ध्यान, भजन और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करने से मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। 6. दान-पुण्य और सेवा : अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, कंबल और जरूरतमंदों की आवश्यक वस्तुओं का दान करना पुण्यकारी माना गया है। 7. ब्रह्मचर्य का पालन : कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। प्रदोष काल में दीपदान और दीपमाला प्रज्वलन : कार्तिक मास में संध्याकाल के दौरान दीप प्रज्वलित करना विशेष महत्व रखता है। सूर्यास्त के आसपास प्रदोष काल में श्रद्धालु देवालयों और शिवालयों में दीपदान करते हैं। भगवान शिव के समक्ष दीप जलाना, भगवान विष्णु को दीप अर्पित करना और मंदिर परिसर में दीपमाला प्रज्वलित करना धार्मिक आस्था की प्राचीन परंपरा है। नियमित दीपदान से घर-परिवार में सुख, शांति और मंगल की कामना की जाती है। ब्रह्ममुहूर्त में नदी में स्नान और सूर्यदेव को अर्घ्य : कार्तिक मास में ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करने की विशेष परंपरा है। श्रद्धालु पवित्र नदियों और तीर्थस्थलों में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते हैं तथा भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। कार्तिक मास में पवित्र स्नान के साथ जप, ध्यान और पूजा-पाठ करने का विशेष महत्व है। जो श्रद्धालु नदी या तीर्थ तक नहीं पहुंच सकते, वे घर पर स्नान करके भगवान का स्मरण और सूर्योपासना कर सकते हैं। तुलसी पूजन से श्रीहरि की आराधना : कार्तिक मास में तुलसी पूजन का विशेष विधान है। सनातन परंपरा में तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना गया है। श्रद्धालु प्रातःकाल तुलसी को जल अर्पित करते हैं और संध्याकाल तुलसी के समीप दीप प्रज्वलित करते हैं। तुलसी की परिक्रमा, भगवान विष्णु का स्मरण और तुलसी विवाह की परंपरा इस महीने के धार्मिक महत्व को और बढ़ाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी पूजन से परिवार में सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है। तुलसी का पौधा पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। श्रद्धालु भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप का पूजन करते हैं और विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं।