विजयदशमी के अवसर पर कोटा के नांता स्थित बड़ा अखाड़ा परिसर में जेठी समाज द्वारा सालों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए अनोखा उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक रूप में परंपरा अनुसार अखाड़े की मिट्टी से निर्मित रावण की विशेष पूजा-अर्चना व प्रतीकात्मक आयोजन संपन्न हुए। 150 साल से ज्यादा पुरानी रियासतकालीन परंपरा जेठी समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार, अखाड़े की मिट्टी से रावण बनाने की यह परंपरा रियासतकालीन राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही है। समाज की ओर से नवरात्र की शुरुआत में श्राद्ध पक्ष के दौरान अखाड़े की पवित्र मिट्टी को एकत्र कर रावण का स्वरूप तैयार किया गया था और उस पर ज्वारे उगाए गए थे। नवरात्र पर्व के दौरान 9 दिनों तक मंदिर के गर्भगृह के मुख्य पट पूरी तरह से बंद रहे। इस अवधि में केवल पुजारी और व्यवस्थापकों को ही अंदर प्रवेश की अनुमति थी, जबकि आम श्रद्धालुओं ने बाहर से ही दर्शन-पूजन किया। 9 दिनों तक चले विशेष गर्बा व पूजा-अर्चना के बाद आज विजयदशमी के दिन यह उत्सव पूर्णाहूति के साथ संपन्न हुआ। पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल और प्रदूषण मुक्त इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत इसका पर्यावरण-अनुकूल होना रहा। पारंपरिक रूप से मिट्टी से बनाए गए रावण के कारण किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता और पूजन के बाद यह मिट्टी फिर अखाड़े में ही विसर्जित हो जाती है, जो पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश देती है। समाज के लोगों ने अपनी कुलदेवी लिम्बजा माता की विशेष आराधना की।