उदयपुर के कन्हैयालाल हत्याकांड के 8 आरोपियों पर आतंकवाद की धाराओं में ही मुकदमा चलेगा। राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी 8 आरोपियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के चार्ज फ्रेम करने के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने मोहम्मद रियाज अत्तारी, मोहम्मद गौस सहित अन्य आरोपियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा- आरोप तय करने के चरण में अदालत 'मिनी-ट्रायल' नहीं चला सकती है। खंडपीठ ने कहा- इस स्टेज पर केवल यह देखना होता है कि क्या अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई सामग्री से आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया केस बनता है या नहीं। अगर आरोपियों के खिलाफ 'गंभीर संदेह' मौजूद है तो कोर्ट का आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करना पूरी तरह से सही है। बता दें कि एनआईए की विशेष अदालत ने 12 जनवरी 2024 और 13 फरवरी 2024 को आरोपियों के खिलाफ UAPA, IPC और आर्म्स एक्ट के तहत आरोप तय किए थे। किसी भी आतंकवादी संगठन से संबंध नहीं आरोपियों की ओर से एडवोकेट मोहम्मद सलीम, एडवोकेट सैयत सआदत अली और अन्य ने कोर्ट को बताया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत या सामग्री मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी कभी किसी गैरकानूनी या आतंकवादी संगठन के सदस्य रहे हैं।या उन्होंने किसी ऐसे संगठन के इशारे पर काम किया है। वहीं यह पूरा मामला कथित तौर पर नूपुर शर्मा द्वारा की गई टिप्पणियों को मृतक कन्हैया लाल द्वारा सोशल मीडिया पर शेयर करने के बाद पैदा हुए विवाद से जुड़ा है। मृतक के इस कृत्य से भले ही आरोपी आक्रोशित हुए हों, लेकिन यह कृत्य अपने आप में इतना बड़ा आधार नहीं है कि आरोपियों पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) जैसा कड़ा कानून थोप दिया जाए। आरोपियों के वकीलों ने दावा किया कि पुलिस द्वारा बरामद किए गए वीडियो में ऐसा कोई शब्द, अभिव्यक्ति अथवा सामग्री नहीं है, जिसे सार्वजनिक शांति भंग करने, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और क्षेत्र की सुरक्षा को खतरा पैदा करने वाला माना जाए। औपचारिक सदस्यता होना जरूरी नहीं मामले में एनआईए के वकीलों ने दलील दी कि UAPA की धाराओं के तहत आपराधिक साजिश का दायरा बेहद बड़ा है। इसमें केवल आतंकवादी कृत्य को अंजाम देना ही शामिल नहीं है, बल्कि उसके लिए की गई साजिश, प्रयास, उकसाना, सलाह देना, सहायता करना और घटना की तैयारी करना भी अपराध के दायरे में आता है। इसके लिए आतंकवादी कृत्य का पूरी तरह पूरा होना जरूरी नहीं है। इस मामले को केवल सोशल मीडिया मैसेज तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता है। आरोपियों द्वारा दी गई धमकियां, घटना के बाद उनका आचरण, उनके पास से बरामद वीडियो और जांच में एकत्र की गई अन्य सामग्रियां सामूहिक रूप से बड़ी साजिश की ओर इशारा करती हैं। इन सब की जांच ट्रायल के दौरान ही हो सकती है। चार्ज की स्टेज पर इसका फैसला नहीं किया जा सकता है। एनआईए ने कहा- आरोपियों का यह कहना कि वे किसी संगठन के सदस्य नहीं हैं, उन्हें आरोपों से मुक्त नहीं करता है। आतंकवाद की धाराओं में चलेगा मुकदमा हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसलों को सही ठहराते हुए कहा- केस में मौजूद वीडियो में सामग्री, धमकियों और आरोपियों के बीच संबंधों की जांच ट्रायल के दौरान ही संभव है। इसे इस शुरुआती चरण में खारिज नहीं किया जा सकता है। ऐसे में साफ है कि सभी आरोपियों पर आतंकवाद की धाराओं में ही मुकदमा चलेगा।