कोटा में ड्रग तस्करी के मामलों में पुलिस की गंभीर लापरवाही का बड़ा खुलासा हुआ है। पिछले तीन साल में 46 मामलों में से 44 तस्कर अदालत से बरी हो गए, जहां जांच में हुई गलतियों का सीधा फायदा आरोपियों को मिला। सबूतों की सही तरीके से हैंडलिंग नहीं होने, जब्त मादक पदार्थ की सील तोड़ने और वजन में अंतर जैसी चूकों ने केस को कमजोर कर दिया। नतीजतन अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए अधिकांश आरोपियों को बरी कर दिया, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। दरअसल, कोटा शहर और ग्रामीण पुलिस की ओर से ड्रग तस्करी के मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार करते समय एनडीपीएस एक्ट की धाराओं की पालना नहीं करने और बाद में प्रॉपर जांच नहीं करने से संदेह का लाभ मिलने के कारण आरोपी बरी हो रहे हैं। भास्कर की ओर से किए गए अदालती फैसलों के विश्लेषण में सामने आया कि प्रकिया लंबी होने के कारण पुलिस धारा 50 (तलाशी का अधिकार) और धारा 42 (अधिकार क्षेत्र) का कई बार उल्लंघन कर रही है। जबकि, आरोपियों को सजा दिलाने में इनकी भूमिका अहम है। पुलिस 90 फीसदी मामलों में स्वतंत्र गवाह नहीं बना रही है, जबकि कोर्ट में हर केस में इसे लेकर सवाल खड़े हुए हैं। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (सीसीटीवी, कॉल डिटेल) नहीं जुटाना और कागजों में ओवरराइटिंग करने से कोर्ट में पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े हो रहे हैं। तस्करों को फायदा मिलने वाली गलतियां एक थाने की ही नहीं, बल्कि अधिकांश थानों की पुलिस कर रही है। इसी कारण तीन साल में पकड़े गए 46 तस्करों में से 44 तस्करों को कोर्ट में संदेह का लाभ मिला और वे सभी कोर्ट से बरी हो गए। जानिए, किन मामलों में पुलिस की लापरवाही से कई तस्कर हुए बरी जब्त गांजे की सील पत्थर से तोड़ी, फिर कहा- सही थी थाने में माल के साथ छेड़छाड़ होने का शक हुआ। बरामदगी और गिरफ्तारी दोनों की लिखा-पढ़ी (फर्द चैकिंग एवं जब्ती रिपोर्ट) में समय को लेकर ओवरराइटिंग थी, जिसे फ्लूइड लगाकर काट-छांट की गई थी। गांजा 55 दिन थाने में रखा, एफएसएल नहीं भेजा। पुलिस ने गांजा बेचने के आरोप में इंसाफ मंसूरी को भी गिरफ्तार किया, लेकिन सबूतों से साबित नहीं कर सकी। सबूत-कनेक्शन कुछ नहीं, सिर्फ मौखिक बयानों पर केस पुलिस का दावा था कि सुजान सिंह की सूचना पर 21 किलो गांजा पकड़ा, लेकिन पत्रावली पर साक्ष्य नहीं है। कॉल डिटेल अथवा अन्य सबूतों से गांजा खरीद और दोनों आरोपियों का कनेक्शन साबित नहीं किया। राम सिंह को सिर्फ मौखिक बयानों के आधार पर आरोपी बनाया गया। बाड़े के मालिकाना हक को लेकर कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया। वार्ड पार्षद या राजस्व अधिकारी से कोई पुष्टि नहीं करवाई। गांजा कहां से मिला (टापरी के कोने से, बाड़े के कोने से, या खुली जगह से) इस पर भी विरोधाभास था। सारी कार्रवाई दोपहर 12 बजे हुई, लेकिन कोई स्वतंत्र गवाह नहीं बनाया 83 किलो डोडा चूरा कोर्ट में गया तो 3 किलो हुआ कम कार का तलाशी वारंट नहीं लिया और न ही स्वतंत्र गवाह बनाए। आरोपियों के मोबाइल की कॉल डिटेल, टावर लोकेशन या टोल नाके का सीसीटीवी फुटेज जैसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी पुलिस के पास नहीं थे। पुलिस यह भी साबित नहीं कर सकी कि आरोपियों की ओर से फर्जी नंबर प्लेट का उपयोग किया गया था या वाहन के दस्तावेजों में हेराफेरी की गई थी। आरोपी को वैधानिक अधिकारों के बारे में नहीं बताया धारा 50 एनडीपीएस एक्ट का उल्लंघन होने से केस स्टेंड नहीं हुआ। मामला 'चांस रिकवरी' का भी नहीं बनता, क्योंकि तलाशी लेने से पहले ही आरोपी के पास मादक पदार्थ होने का संदेह था। वहीं, व्यस्त सड़क और लोगों की आवाजाही के बावजूद पुलिस ने किसी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया। तलाशी, तुलाई, जब्ती, एफएसएल…सभी में खामियां छोड़ी तलाशी के लिए दिए गए नोटिस की कार्बन प्रति में बाद में पेन से लिखना संदेहास्पद रहा। स्वयं जब्ती अधिकारी ने तलाशी ली, वो खुद स्वतंत्र अधिकारी नहीं हो सकता। जब्तशुदा माल को तौलने के तरीकों में पुलिसकर्मियों के बयान विरोधाभासी रहे। जब्त माल, मालखाना में जमा करने के समय और नोटिस जारी करने के समय में विरोधाभास रहा। एफएसएल में नमूना सील का इंप्रेशन लेकर नहीं जाने से विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा। स्वतंत्र गवाह नहीं बनाया। केवल विजेन्द्र के मौखिक कथनों पर आसम को आरोपी बनाया, कॉल डिटेल, ठोस सबूत नहीं दिए। मंडाना याना जनवरी 2022 में नासिर को 1 किलो 93 ग्राम गांजा सहित पकड़ा, जिसे कोर्ट ने अगस्त 2025 को बरी किया। तलाशी, जब्ती, पर संदेह हुआ। स्वतंत्र गवाह नहीं बनाया। अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्रवाई, जब्ती प्रूव नहीं कर पाए पुलिस ने दिसंबर 2019 में हारून मंसूरी को 7.620 ग्राम स्मैक सहित पकड़ा, जिसे कोर्ट ने जनवरी 2025 में बरी किया। तलाशी, प्रिंटर की मौके पर मौजूदगी, जब्ती के महत्वपूर्ण दस्तावेज (फर्द चैकिंग एवं जब्ती), धारा 50(6) का उल्लंघन जैसी खामियों से कोर्ट को संदेह हुआ।