राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े गुरुवार को जालोर दौरे पर पहुंचे। उन्होंने पुलिस लाइन के पास भामाशाह रमेश जैन द्वारा 10 लाख रुपए की लागत से बनाए गए शहीद स्मारक और राजेंद्र नगर रोड स्थित जालोर नागरिक सहकारी बैंक लिमिटेड कार्यालय का लोकार्पण किया। सभा में उन्होंने कहा कि राजनीति में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलने की प्रक्रिया चल रही है और इस पर जल्द निर्णय संभव है। साथ ही सहकारिता व्यवस्था और क्षेत्र के इतिहास से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी बात रखी। महिलाओं के आरक्षण पर कही यह बात राज्यपाल ने सभा को संबोधित करते हुए कहां कि माता-बहनों के लिए आज गौरव की बात हैं। आज जालोर में नागरिक बैंक का लोकार्पण किया गया हैं। वही, उन्होंने कहा कि राजनीति में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलने की प्रक्रिया चल रही है और इस पर निर्णय जल्द हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि बैंक के उद्घाटन की तारीख भले लोगों को याद रहे या नहीं, लेकिन महिलाओं के आरक्षण की तारीख सभी को याद रहेगी। जालोर के इतिहास पर शोध की मांग मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने सभा में कहा कि जालोर का इतिहास पूरी तरह सामने नहीं आ पाया है। उन्होंने कहा कि जालोर दुर्ग में वीरमदेव और काहनड़देव के निवास और सेनापतियों के महलों की जानकारी स्पष्ट नहीं है। उन्होंने पुरातत्व विभाग और इतिहासकारों से मिलकर क्षेत्र के इतिहास की जांच और शोध करने की पत्र के माध्यम से मांग रखी। साथ ही जाबाली ऋषि की तपस्या और जालंधरनाथ महाराज से जुड़े तथ्यों की भी जांच कराने की बात कही। सहकारिता व्यवस्था पर उठाए सवाल गर्ग ने राजस्थान में सबसे बड़ी कमी जो मुझे नजर आती है। वह है कि सहाकरिता क्षेत्र में सरकारी अधिकारियों का हस्तक्षेप बहुत अधिक है, जिससे संस्थानों को नुकसान होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पूर्व सांसद बूटासिंह के समय स्थापित पांच ऑयल मिल बनाई थी, जिसमें एक जालोर में थी। यहां सरसों का बड़ा क्षेत्र था। मगर, इन मिलों में से चार बंद हो गईं। गर्ग बोले- अगर जालोर की ऑयल मिल चली होती तो जालोर के किसान माला-माल हो गए होते। उन्होंने बताया कि उसमें जो अधिकारी लगते थे मनमानी कर के चले जाते हैं। उस कारण संस्थान को नुकसान झेलना पड़ता था। उन्होंने गुजरात मॉडल का जिक्र करते हुए कहा कि वहां जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही ज्यादा होती है और प्रशासनिक हस्तक्षेप कम होने से व्यवस्था बेहतर रहती है। इस लिए वहां भष्ट्राचार नहीं होता। सहकारिता संस्थान के एमड़ी व अन्य अधिकारी भी वहां के जन प्रतिनिधि तय करते हैं। जन प्रतिनिधि को आम जनता को जबाव देना पड़ता हैं। लेकिन अधिकारी को किसी को जबाव नहीं देना वह सोचते है पकड़े गए तो जबाव देंगे। वरना दो-तीन साल रह कर निकल जाएंगे। उन्होंने कहां कि राजस्थान में भी गुजरात मॉडल को अपनाने की बात की। कर्मचारियों के मामलों में देरी का मुद्दा उठाया गर्ग ने राज्यपाल से निवेदन किया कि छोटे कर्मचारियों के मामलों में सुनवाई में देरी होती है, जिससे उनका इंक्रीमेंट रुक जाता है और कई बार निर्णय आने से पहले ही वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं या उनकी मृत्यु हो जाती है। उन्होंने कहा कि लंबित फाइलों के कारण हजारों मामले अटके हुए हैं, ऐसे में इनके शीघ्र समाधान के लिए व्यवस्था बनाने की जरूरत है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में शहरवासी और महिलाएं मौजूद रहीं।