राजस्थान हाईकोर्ट ने बीकानेर नगर निगम द्वारा जारी किए गए राजस्व वृद्धि और शहरी विकास कर वसूली से संबंधित टेंडर को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश संजय कुमार अग्रवाल और न्यायाधीश बलजिंदर सिंह संधू की बेंच ने वाणिज्यिक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विशुद्ध रूप से व्यावसायिक और वाणिज्यिक अनुबंधों के मामलों में जनहित याचिका के जरिए न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित होता है। ये है मामला मामला बीकानेर नगर निगम द्वारा संपत्तियों के सर्वेक्षण, स्पॉट बिलिंग, डिमांड नोटिस के वितरण और शहरी विकास कर की वसूली के लिए 10 जुलाई 2026 को जारी किए गए टेंडर नोटिस से जुड़ा है। इसके बाद 27 जुलाई 2026 को एक शुद्धिपत्र भी जारी किया गया था। याचिकाकर्ता नरेंद्र सिंह ने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि टेंडर की कुल अनुमानित राशि लगभग 10 करोड़ रुपये तक बढ़ाए जाने के बावजूद, इसकी पात्रता शर्तों में ढील दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि सर्वेक्षण के तय लक्ष्यों को हटाने और तकनीकी व अनुभव संबंधी शर्तों को संशोधित करने से प्रक्रिया में पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है और पक्षपात की आशंका पैदा होती है। नगर-निगम बीकानेर ने विरोध दर्ज किया था मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम, बीकानेर की ओर से कड़ा विरोध दर्ज कराया गया। निगम ने स्पष्ट किया कि वार्डों की सीमाओं के नए सिरे से निर्धारण और मूल्यांकन के बदलते मापदंडों के कारण सर्वेक्षण के दायरे को संशोधित किया गया है, जिसका उद्देश्य किसी भी शर्त को कम करना नहीं बल्कि सभी संपत्तियों (कर योग्य और गैर-कर योग्य) को इसके दायरे में लाना है। निगम ने यह भी तर्क दिया कि संशोधित शर्तें प्रतिस्पर्धा को और अधिक व्यापक बनाने के साथ-साथ तकनीकी और वित्तीय रूप से सक्षम एजेंसियों को आकर्षित करने के लिए बनाई गई थीं। नियमों का भी दिया हवाला इसके अलावा, 'राजस्थान पारदर्शिता सार्वजनिक उप्रवासन अधिनियम, 2012' के प्रावधानों का हवाला देते हुए बताया गया कि टेंडर की शर्तें और योग्यताएं तय करना पूरी तरह से खरीद करने वाले प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए माना कि यह अनुबंध पूरी तरह से कमर्शियल (व्यापारिक) है और याचिकाकर्ता ने खुद इस टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया था। चूंकि यह मामला किसी भी बुनियादी अधिकार के हनन या वंचित वर्ग से जुड़ा नहीं था, इसलिए एक बाहरी व्यक्ति द्वारा इस तरह की जनहित याचिका दायर करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।
हाईकोर्ट ने दोहराया कि न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य यह जांचना नहीं है कि टेंडर किसे मिलना चाहिए या उसकी शर्तें कैसी होनी चाहिए। नीतिगत और वाणिज्यिक मामलों में अर्थशास्त्र और तकनीक को अपनी भूमिका निभाने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए, जब तक कि प्राधिकारी का कोई कदम दुर्भावनापूर्ण या अवैध न साबित हो। कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद यह पाया कि 27 जुलाई 2026 को जारी किया गया शुद्धिपत्र अधिनियम और नियमों के तहत निर्धारित समय-सीमा और प्रक्रियाओं के पूर्ण अनुपालन में था। इन तमाम कानूनी पहलुओं और तर्कों के आधार पर खंडपीठ ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि टेंडर नोटिस या उसका शुद्धिपत्र किसी भी प्रकार से मनमाना, भेदभावपूर्ण या गैर-कानूनी था। कोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।