सरकारी टीचर नौकरी के साथ डार्क जोन में खेती कर रहे हैं। जहां जमीन में पानी 800 फीट से भी नीचे चला गया। उन्होंने कम पानी में होने वाली अरंडी की फसल को कमाई का जरिया बनाया। एक रोग के कारण खड़ी फसलें सूखकर खराब होने लगी तो कई सालों तक खेत खाली पड़े रहे। पिछले साल बीज बदलकर 22 बीघा में खेती की तो करीब 9 लाख की इनकम हुई। अच्छे मुनाफे को देखते हुए इस बार खेती का रकबा बढ़ाकर 40 बीघा कर दिया। किसान का कहना है- नकदी फसलों की तरह बुवाई के 2 महीने बाद ही कमाई शुरू हो जाती है, जो साल भर चलती है। अगर किसान को अचानक पैसों की जरूरत पड़े तो पके हुए गुच्छों की कटिंग करके बाजार में बेच सकता है। म्हारे देश की खेती में इस बार बात जोधपुर के किसान की … तिंवरी तहसील के चंडालिया गांव के किशन सिंह (29) सरकारी टीचर हैं। 2023 में ग्रेड सेकंड टीचर के पद पर सिलेक्ट हुए। नौकरी के साथ खेती में भी एक्टिव हैं। किशन सिंह के पिता सोहन सिंह (64) पिछले 40 साल से अरंडी की खेती कर रहे हैं। परिवार के पास कुल 64 बीघा जमीन है। अच्छी पैदावार और मुनाफे के कारण इस बार रकबा 22 बीघा से बढ़ाकर 40 बीघा कर दिया है। डार्क जोन में खेती करना चुनौती किशन सिंह बताते हैं - जोधपुर समेत पश्चिमी राजस्थान के कई इलाकों में कम बारिश के कारण खेती करना चुनौती बन गया है। जमीन में पानी का स्तर भी लगातार नीचे जा रहा है। परदादा के समय करीब 80 साल पहले जमीन में 15 से 30 फीट पर पानी मिल जाता था। 1967 तक कुई की खुदाई करवाकर इसे करीब 57 फीट तक गहरा किया गया। इसके बाद पानी की समस्या बढ़ती गई। 800 फीट से ज्यादा की गहराई पर मिल रहा पानी करीब 43 साल पहले पानी की जरूरत पूरी करने के लिए कुएं में ही 100 फीट गहराई का बोरवेल करवाना पड़ा। 1996 तक बोरवेल की गहराई बढ़ाकर करीब 210 फीट करनी पड़ी। इस स्तर पर भी भूजल कम हो गया। इसके बाद 1996 में अलग से 320 फीट गहरा बोरवेल करवाया गया। उस समय इससे एक साथ 50 फव्वारे चल जाते थे। बाद में इस बोरवेल का पानी भी कम होने लगा। इसके बाद 2007 में दूसरा बोरवेल करवाया गया, जिसमें करीब 450 फीट की गहराई पर पानी मिला। इसकी खुदाई आगे बढ़ाकर 800 फीट तक करवाई गई। अब इस पानी में खारापन आने लगा है, लेकिन हल्के खारे पानी से अरंडी के पौधों को नुकसान नहीं होता। अरंडी को 15 दिन में एक सिंचाई की जरूरत अरंडी को दूसरी कई फसलों के मुकाबले कम पानी की जरूरत होती है। 15 दिन में एक बार सिंचाई करनी होती है। करीब 10 साल पहले अरंडी की फसल में ऊब सूख रोग के कारण किसानों का इस खेती से भरोसा कम हो गया था। कई किसानों ने इसका रकबा घटा दिया था। अब बीमारी को सहन करने वाली वैरायटी आने और अच्छे भाव मिलने से किसान फिर अरंडी की खेती की तरफ लौट रहे हैं। जैविक तरीके से खेती में ज्यादा फायदा किशन सिंह बताते हैं- दोमट और काली मिट्टी में अरंडी की पैदावार अच्छी होती है। हम लंबे समय से जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं। खेत में गाय और बकरी के गोबर से तैयार खाद का इस्तेमाल करते हैं। अरंडी की बुवाई के लिए प्रति बीघा करीब 1 किलो बीज की जरूरत होती है। बाजार में अरंडी का बीज करीब 500 से 600 रुपए किलो तक मिलता है। इस बार खेत में अरंडी की तीन वैरायटी लगाई हैं, ताकि होने संभावित नुकसान से बचा जा सके। सबसे ज्यादा माइको-419 वैरायटी लगाई है, जो ऊब सूख बीमारी को सहन करने वाली वैरायटी है। यह बीज बाजार में करीब 570 रुपए प्रति किलो तक मिलता है। अगेती फसल से फायदा, साल में 6 बार कटिंग किशन सिंह बताते हैं - अरंडी का पौधा करीब एक साल तक चलता है। बुवाई के लगभग 70 से 80 दिन बाद पहली कटाई शुरू हो जाती है। इस दौरान पौधे के ऊपरी हिस्से की कटिंग करनी चाहिए, इससे फुटाव बढ़ता है और लंबाई बढ़ने के बजाय साइड में भी फैलता है। इससे गुच्छों की कटाई करने में आसानी रहती है। पहली कटिंग के बाद हर 15 से 20 दिन में पौधे पर नए गुच्छे तैयार हो जाते हैं। सालभर में कम से कम 6 से 7 बार कटाई होती है। कटिंग के बाद गुच्छों को धूप में सुखाया जाता है। फिर मशीन से प्रोसेस करके बीज अलग किए जाते हैं। सर्दी के बाद उत्पादन हो जाता है दोगुना अरंडी का पौधा पाला सहन नहीं कर सकता है, मई-जून में अगेती बुवाई करना फायदेमंद रहता है। अब तक दो कटाई हो चुकी है, अब कटाई चल रही है। सर्दी के बाद पौधों की कटिंग करनी चाहिए, इससे पौधे में नई शाखाएं निकलती हैं और फुटाव होता है। इसके बाद उत्पादन दोगुना हो जाता है। किशन सिंह बताते हैं- अरंडी की खेती में ऊब सूख रोग सबसे बड़ी समस्या है। इस बीमारी में पौधा धीरे-धीरे सूखकर खत्म हो जाता है। इसके अलावा रस चूसने वाले कीट और मेला भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। एक बीघा से 50 हजार रुपए तक इनकम किशन सिंह बताते हैं- अरंडी की खेती में मजदूरी का खर्च दूसरी कई फसलों के मुकाबले कम रहता है। पिछले साल 22 बीघा में अरंडी की खेती की थी। इसमें 244 बोरी उत्पादन हुआ था। एक बोरी में 80 किलो के हिसाब से कुल 19 हजार 520 किलो अरंडी पैदा हुई। इससे करीब 12 लाख रुपए की आमदनी हुई थी। इस फसल में बीज पर करीब 20 हजार रुपए, खाद पर डेढ़ लाख रुपए, एक अन्य बीज मद पर 15 हजार रुपए, मजदूरी पर 1 से सवा लाख रुपए और मशीनरी की सफाई पर करीब 30 हजार रुपए खर्च हुए। कुल खर्च करीब 3 से 3.25 लाख रुपए आया। सभी खर्च निकालने के बाद करीब 8.75 से 9 लाख रुपए की शुद्ध बचत हुई। बाजार में 5,500 से 8,900 रुपए प्रति क्विंटल भाव किशन सिंह बताते हैं - पिछले साल अरंडी का भाव सीजन की शुरुआत में करीब 5,500 रुपए प्रति क्विंटल था। सीजन के आखिरी समय तक यह बढ़कर 7 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था। इस बार शुरुआत से ही पिछले साल के मुकाबले करीब 2 हजार रुपए ज्यादा भाव मिल रहा है। फिलहाल बाजार में करीब 8,500 रुपए प्रति क्विंटल भाव चल रहा है। इस साल एक बार भाव 8,900 रुपए प्रति क्विंटल तक भी पहुंच गया था। --- खेती किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए…. बुजुर्ग किसान का खेती में प्रयोग, कम मेहनत, ज्यादा कमाई:ससुराल से मिला था आइडिया, अब खेत पर ही पहुंच रहे खरीददार रिटायरमेंट के बाद जिस में उम्र लोग आराम करते हैं, किसान खेत में मेहनत कर रहा है। उम्र 64 साल है, लेकिन काम करने की आदत अब भी वैसी ही है। पूरी खबर पढ़िए