राजधानी के करधनी में सीवर में उतरने से हुई दो मजदूरों की मौत ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी है। सरकारें ‘शून्य मृत्यु’, मशीनीकरण और सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मजदूर आज भी बिना सुरक्षा उपकरण के जहरीली गैस वाले सीवर में उतरने को मजबूर हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की हाल ही में जारी रिपोर्ट भी चौंकाने वाली तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 17 मार्च 2026 तक देश में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 622 लोगों की मौत हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में 86, महाराष्ट्र में 82, तमिलनाडु में 77, हरियाणा में 76, गुजरात में 73 और दिल्ली में 62 मौतें दर्ज की गई हैं। राजस्थान भी 37 मौतों के साथ सर्वाधिक मौत वाले टॉप-10 राज्यों में शामिल है। यह दिखाता है कि यहां इस समस्या को लेकर गंभीरता अब भी पर्याप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी असरहीन? 20 अक्टूबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि बिना सुरक्षा उपकरण के सीवर में उतरना अपराध है। ऐसी मौतों में सख्त जवाबदेही तय हो, मुआवजा बढ़ाकर 30 लाख रुपए किया जाए। उल्लंघन पर 5 साल तक की सजा का प्रावधान है। इनसैनिटरी टॉयलेट बनाना भी गैरकानूनी है। वाल्मीकि सफाई कर्मचारी संगठन ने जताया विरोध वाल्मीकि सफाई कर्मचारी संगठन ने इस घटना को लेकर नाराजगी जताई है। संगठन के अध्यक्ष नंदकिशोर डंडोरिया ने आरोप लगाया कि ठेकेदार और निगम के अधिकारी केवल कागजों में सुरक्षा मानकों की पूर्ति दिखाकर कर्मचारियों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। संगठन ने दोषियों की गिरफ्तारी, मृतकों के परिजनों को एक-एक करोड़ रुपए मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी है कि मांगें पूरी नहीं होने पर सफाई कर्मचारी कार्य बहिष्कार करेंगे। ‘नमस्ते’ योजना बनाम हकीकत... केंद्र सरकार की नमस्ते (नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सेनिटेशन इकोसिस्टम) योजना का उद्देश्य साफ है- सीवर सफाई में शून्य मृत्यु, पूरी तरह मशीनीकरण और सभी कर्मियों को पीपीई किट व प्रशिक्षण। करधनी जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि मजदूर बिना सुरक्षा उपकरण के काम कर रहे हैं। प्रशिक्षण और सुपरविजन की कमी है और योजना का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर कमजोर है। बड़े सवाल: जवाबदेही तय क्यों नहीं? मशीनें हैं, सिस्टम जिम्मेदारी तय नहीं हैं “आज शहरों में मशीनों की कमी नहीं है, लेकिन उनका सही उपयोग नहीं हो रहा। काम ठेके पर होने के कारण निगरानी कमजोर हो जाती है। जब तक अधिकारियों और ठेकेदारों की जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं रुकना मुश्किल है। एक कहावत है- ‘नजर हटी, दुर्घटना घटी।’ यहां भी यही हो रहा है।” -अब्दुल अयूब गौरी, पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी, जयपुर निगम