उदयपुर के धोल की पाटी स्थित जैन मंदिर में मुनि आचार्य आदित्य सागर का मंगल प्रवेश हुआ। इस दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए समाज की कुरीतियों, संस्कारों और साधु के सही अर्थ पर बेबाकी से अपनी बात रखी। मुनि आदित्य सागर ने घोषणा की कि वे अगले 4 महीने तक उदयपुर में ही रहेंगे और उनका चातुर्मास यहीं संपन्न होगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि चातुर्मास में क्या आया और क्या गया, यानी क्या आय-व्यय रहा, इससे उनका कोई सरोकार नहीं है। यह सब देखना और संभालना समाज का काम है। वे केवल अपनी साधना करेंगे और जैसे ही चातुर्मास का समय पूरा होगा, वे यहां से विहार कर जाएंगे। बिना चरित्र के इंसान घुन लगे गेहूं जैसा मुनि आदित्य सागर ने आज के समाज में युवाओं और बच्चों की स्थिति पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोगों को खुद का इंटरैक्शन पसंद नहीं आ रहा है। हर कोई अपने फोन में बिजी है, स्टेटस लगाने में मस्त है। इस अकेलेपन और भटकाव का एक बहुत बड़ा कारण पढ़ाई की व्यवस्था भी है। आठवीं और दसवीं क्लास से ही बच्चों को घर से दूर बाहर पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है। वहां वे अकेले रहते हैं और जो उनका मन करता है, वही करते हैं। अकेले रहने की यह आदत बच्चों को बिगाड़ देती है क्योंकि वहां उन्हें कोई देखने-टोकने वाला नहीं होता। उन्होंने पढ़ाई कर रहे बच्चों को सीधा संदेश देते हुए कहा कि अगर आपके पास कैरेक्टर (चरित्र) नहीं है, तो यह समझ लीजिए कि आप एक घुन लगे गेहूं के समान हैं। ऐसे गेहूं को जब पीसा जाएगा तो उससे आटा नहीं मिलेगा, बल्कि सिर्फ कचरा ही हाथ आएगा। इसलिए जीवन में संस्कारों और चरित्र का होना सबसे ज्यादा जरूरी है। संस्कार शिविरों से बदल रहा बच्चों का जीवन मुनि ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि वे बच्चों के संस्कार बचाने के लिए लगातार कार्यक्रम और शिविर करते हैं। हालांकि, हजारों बच्चों में से 5-10 बच्चे ऐसे भी होते हैं जो शिविर के बाद भी संस्कारहीन हो जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रयास छोड़ दिया जाए। बाकी बच्चे तो बच जाते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे भीषण गर्मी के मौसम में अगर किसी को एक कटोरी पानी भी मिल जाए, तो उसकी प्यास बुझ जाती है। ठीक उसी तरह बच्चों के संस्कार बचाने का यह प्रयास भी है। संस्कार मिलने के बाद केवल 1 से 2 परसेंट बच्चों में ही ऐसा रिजल्ट दिखता है, जिन्होंने नियम तोड़ दिए, लेकिन ज्यादातर सकारात्मक और अच्छे परिणाम ही सामने आए हैं। इसी वजह से वे इसे आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी साफ किया कि धर्म किसी जाति विशेष का नहीं होता। जैन धर्म हो या कोई अन्य दर्शन, जो इसे स्वीकार कर ले, धर्म उसी का हो जाता है। उनके द्वारा आयोजित होने वाले संस्कार शिविर और दंपत्ति संस्कार शिविर में दस लक्षण पर्व के दौरान अन्य लोग भी बैठ सकते हैं। पूजन-अभिषेक का नियम लोग अपने हिसाब से तय कर सकते हैं, लेकिन संस्कार का असली मतलब यही है कि हम एक-दूसरे के प्रति वफादार रहें। दिखावे की शादियों पर किया करारा प्रहार समाज में बढ़ रहे दिखावे के चलन पर मुनि श्री ने तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आज चारों तरफ दिखावे का जो दौर चल रहा है, वह असल में असत्य का दौर है। शादी-ब्याह में 25 प्रकार के व्यंजन और 100 प्रकार की डिशेज बनाई जा रही हैं। लोग सिर्फ इसलिए अंधाधुंध पैसा बहा रहे हैं क्योंकि फलां व्यक्ति ने इतनी बड़ी शादी की थी, तो हमें भी वैसी ही करनी है। जो भाग्य में लिखा है, वही होना है उन्होंने समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि ऐसा करने से आपका स्टेटस बढ़ नहीं रहा है, बल्कि गिर रहा है। एक बड़ी और खर्चीली शादी करने के बाद इंसान अगले दो साल तक भारी तनाव में रहता है क्योंकि उसे वह कर्जा चुकाना होता है। उन्होंने मुहूर्त निकालने की प्रथा पर भी तंज कसते हुए कहा कि लोग मुहूर्त के पीछे भागते हैं, जबकि असलियत यह है कि जो भाग्य में लिखा है, वही होना है। मुनि श्री ने समाज के उन फैसलों की सराहना की जहां भोजन में केवल 15 चीजें बनाने का नियम लागू किया गया है और खर्चों की लिमिट तय की गई है। इससे समाज का पैसा बर्बाद होने से बचता है और यही बचा हुआ धन विपरीत परिस्थितियों में काम आता है। उन्होंने हर समाज को यह सुझाव दिया कि वे अपना एक सामूहिक वैवाहिक स्थान बनाएं, जहां बेहद कम खर्च में और पूरी शुद्धता के साथ विवाह संपन्न हो सकें। 2008 में खुद संस्कार शिविर से साधु बनने की प्रेरणा मिली साधु के सच्चे स्वरूप को समझाते हुए मुनि आदित्य सागर ने कहा कि उनके चातुर्मास का सबसे बड़ा कार्यक्रम संस्कार शिविर ही रहने वाला है। इस शिविर में देश-दुनिया के लाखों श्रावक ऑनलाइन और ऑफलाइन जुड़कर 10 दिनों तक धर्म सीखते हैं। इसी शिविर के दौरान कई बार किसी का मन ऐसा बदलता है कि वह साधु बनने की राह पर चल पड़ता है। उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा राज खोलते हुए बताया कि साल 2008 में वे खुद एक संस्कार शिविर में बैठे थे। उसी शिविर में वे अपने गुरुजी से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने साधु बनने का फैसला कर लिया। उन्होंने कहा कि संस्कार शिविर की परिकल्पना बहुत गहरी है और जैन समाज इसमें बढ़-चढ़कर सहयोग करता है, ताकि आने वाली पीढ़ी संस्कारी बने। अगर लाखों में से एक भी साधु निकल जाता है, तो वह आगे चलकर करोड़ों लोगों को सही राह दिखाने और शिक्षा देने के काबिल बन जाता है। डिफेंडर गाड़ी में घूमने वाले गो-भक्षक हैं, रक्षक नहीं जैन दर्शन में साधु की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जो पांचों इंद्रियों के विषयों से और भविष्य के भवों में मिलने वाले सुखों की आशा छोड़ चुके हैं, जिन्होंने आरंभ और परिग्रह का त्याग कर दिया है और जो हर समय ज्ञान, ध्यान व तप में लीन रहते हैं, वही सच्चे साधु हैं। उन्होंने कहा कि वे कथा वाचन करने वालों को साधु नहीं मानते, वे केवल कथावाचक हैं। साधु वही है जो कठिन तपस्या करता है और तपस्या हमेशा त्याग से आती है, न कि राग से। जैन मुनि सर्वस्व त्याग करके ही इस मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। उन्होंने बिना किसी डर के कहा कि आज अगर कोई साधु यह कहता है कि गो-हत्या नहीं होनी चाहिए, गो-वंश की रक्षा होनी चाहिए और वह खुद करोड़ों की डिफेंडर गाड़ी में घूम रहा है, तो वह गो-वंश का रक्षक नहीं बल्कि भक्षक है। उन्होंने लोगों से कहा कि वे इंटरनेट पर सर्च करके देखें कि एक डिफेंडर गाड़ी के इंटीरियर और उसके पार्ट्स को बनाने में गाय समेत 8 जानवरों को मारकर उनके चमड़े का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में जो लोग हवाई जहाजों और लग्जरी गाड़ियों में सफर कर रहे हैं, वे साधु नहीं बल्कि गृहस्थ या कथावाचक मात्र हैं। जैन मुनि का नाता केवल त्याग और राग-द्वेष को छोड़ने से होता है।