जयपुर| नाबार्ड के माध्यम से सहकारी समितियों के लिए जारी प्रारूप मॉडल मानव संसाधन नीति भले ही कागज पर अच्छी नजर आ रही हो, लेकिन राजस्थान में वहां के कार्मिकों की स्थिति बेहद खराब है। प्रदेश की अधिकांश पैक्स आर्थिक रूप से कमजोर हैं और अपने कर्मचारियों को नियमित वेतन तक नहीं दे पा रही हैं। सहकारी साख समितियां एंप्लाइज यूनियन राजस्थान का कहना है कि नई मानव संसाधन नीति लागू करने से पहले पैक्स कार्मिकों के वेतन भुगतान की ठोस व्यवस्था जरूरी है। प्रदेश की करीब 9000 पैक्स की वास्तविक स्थिति का सरकार आकलन नहीं कर रही न समाधान निकाल रही। अधिकांश पैक्स में कार्मिकों को 6 से 12 महीने तक वेतन नहीं मिल रहा है। न्यूनतम वेतन कानून का पालन भी नहीं हो रहा है। पैक्स में वर्षों से नियमित भर्ती नहीं पैक्स में वर्षों से नियमित भर्ती नहीं होने के कारण एक ही व्यवस्थापक को 4-5 पैक्स का अतिरिक्त कार्यभार संभालना पड़ रहा है। ऐसे में किसान को ऋण वितरण, खाद-बीज उपलब्ध कराने, ऋण वसूली, गोदाम संचालन और ई-मित्र जैसी सेवाएं एक व्यक्ति के लिए संभालना मुश्किल हो रहा है। इसका सीधा असर पैक्स की कार्यप्रणाली और किसानों को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ रहा है। वर्षों से पैक्स में काम कर रहे कार्मिकों को भी पीएफ, ईएसआई, चिकित्सा सुविधा, ग्रेच्युटी, बीमा और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिल रहा है। सहकारी साख समितियां एम्पलाइज यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष सूरज भान सिंह आमेरा ने कहा कि पैक्स कार्मिकों के वेतन भुगतान के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। यूनियन ने मांग की है कि पैक्स के आत्मनिर्भर होने के बाद भी पांच वर्ष तक वेतन के लिए वित्तीय अनुदान जारी रखा जाए।