25 प्रतिशत कोयले की सप्लाई घटी, 15 प्रतिशत बिजली खपत बढ़ी, प्लांटों में 4 दिन का ही कोयला छत्तीसगढ़ और सिंगरौली की कोयला खदानों में पानी भरने से कोयला खनन प्रभावित हुआ है। सप्लाई बाधित होने से प्रदेश के थर्मल बिजलीघरों में कोयला संकट जैसे हालात हैं। इधर, पारा बढ़ने और बारिश कम होने से बिजली की डिमांड भी 15% तक बढ़ी है। बिजलीघरों को रोजाना 22 रैक कोयला चाहिए, लेकिन केवल 16-18 रैक ही मिल रहा है। थर्मल पावर प्लांटों में केवल 4-5 दिन का कोयला बचा है। प्रदेश के बिजलीघरों में कोल इंडिया व उत्पादन निगम की खदानों से कोयले की सप्लाई की जा रही है। प्रदेश में थर्मल पावर प्लांट की क्षमता 7580 मेगावाट है। इसके लिए रोजाना 1.04 लाख टन कोयला चाहिए होता है। वहीं नॉर्मेटिव स्टॉक 21.87 लाख टन निर्धारित है, लेकिन वर्तमान में कोल स्टॉक मात्र 5 लाख टन ही है। कोटा की दो व कालीसिंध की एक यूनिट मेंटेनेंस के कारण बंद प्रदेश में 23 थर्मल प्लांट हैं। छबड़ा में 4 दिन, सूरतगढ़ पावर प्लांट में पांच दिन का कोयला शेष है। कोटा बिजलीघरों में चार दिन का कोयला बचा है। ऐसे में सप्लाई में तीन-चार दिन का व्यवधान होने पर बिजली उत्पादन ठप हो सकता है। कोटा की दो व कालीसिंध की एक यूनिट मेंटेनेंस की वजह से बंद हैं। कोयले की आवक कम, खपत ज्यादा...प्रदेश के सात थर्मल प्लांटों में तय स्टॉक का औसतन 22 फीसदी कोयला बचा है। इनमें पांच थर्मल प्लांट क्रिटिकल श्रेणी में पहुंच गए हैं। कोयले की आवक और खपत में अंतर की वजह से किल्लत बढ़ी है। इधर, उत्पादन निगम के एसई अजय विजयवर्गीय का कहना है कि खदानों में पानी भरने से कोयले की दिक्कत है। बिजलीघरों में 4-5 दिन का स्टॉक बचा हुआ है।