नगर परिषद चुनाव 2026 में मतदान से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस छह साल पहले जैसा प्रदर्शन दोहरा पाएगी। वर्ष 2019 में कांग्रेस ने 60 में से 34 वार्ड जीतकर साफ बहुमत हासिल किया था और नगर परिषद में अपना बोर्ड बनाया था। भाजपा को सिर्फ 10 सीटें मिली थीं, जबकि 16 निर्दलीय उम्मीदवार जीतकर आए थे। उस चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में माहौल और पार्टी संगठन की मजबूती साफ दिखाई दी थी। लेकिन इस बार राजनीतिक हालात बदले हुए हैं और कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं। कांग्रेस के लिए कांग्रेस ही बड़ी चुनौती इस चुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसके अपने लोग हैं। टिकट बंटवारे के बाद कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसका असर कई वार्डों में दिखाई दे रहा है। कई जगह मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच नहीं, बल्कि कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी और कांग्रेस से बागी होकर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार के बीच हो गया है। इसी वजह से इस बार कांग्रेस के लिए 2019 का प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं माना जा रहा। 5 निवर्तमान पार्षद भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ नगर परिषद में लगातार दूसरी बार अपना बोर्ड बनाना सांसद बृजेंद्र ओला के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल है। पिछले कार्यकाल के 5 निवर्तमान पार्षद- मकबूल हुसैन, इशाक फूलका, जब्बार फूलका, नाजिमा बानो और हीना बानो, इस बार भाजपा के साथ हैं। इन नेताओं के पार्टी बदलने से कई वार्डों का राजनीतिक गणित बदल गया है। 10 से ज्यादा वार्ड कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल कांग्रेस के सामने कई ऐसे वार्ड हैं, जहां पार्टी के प्रभावशाली नेताओं की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। इनमें वार्ड 7, 37, 38, 41, 42, 46, 51, 52, 53 और 57 शामिल हैं। इन उम्मीदवारों की जीत कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है। बागी बिगाड़ रहे कांग्रेस का गणित कुछ वार्ड कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल बन गए हैं। वार्ड 37 में कांग्रेस के बागी रियाज खान ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। वहीं, वार्ड 38 में जिला प्रवक्ता शहबाज फारूकी और कोमल निर्वाण के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस की राह और मुश्किल हो गई है। इन वार्डों के नतीजों से पता चलेगा कि कांग्रेस अपनी पुरानी पकड़ बचा पाती है या नहीं। भाजपा को वापसी की उम्मीद भाजपा इस चुनाव को वर्ष 2019 की हार से वापसी का मौका मान रही है। पिछली बार पार्टी सिर्फ 10 सीटें जीत पाई थी। इस बार भाजपा ने टिकट बांटने से लेकर चुनाव प्रचार तक पूरी ताकत लगाई है। पार्टी उन वार्डों में वापसी की कोशिश कर रही है, जहां उसे पिछले चुनाव में हार मिली थी। कांग्रेस में हुई बगावत का फायदा भी भाजपा को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। निर्दलीय फिर बन सकते हैं किंगमेकर वर्ष 2019 के चुनाव में 16 निर्दलीय उम्मीदवार जीतकर पार्षद बने थे। इससे पता चला था कि झुंझुनूं की राजनीति में स्थानीय चेहरों और उनके अपने जनसमर्थन की बड़ी भूमिका रहती है। इस बार भी बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में हैं। कई वार्डों में तीन और चार प्रत्याशियों के बीच मुकाबला है। ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवार भाजपा और कांग्रेस दोनों का चुनावी गणित बिगाड़ सकते हैं। अगर किसी दल को साफ बहुमत नहीं मिलता है, तो निर्दलीय पार्षद बोर्ड बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। मुस्लिम बहुल वार्डों पर भी नजर सामाजिक समीकरण भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। वर्ष 2019 में 25 से ज्यादा मुस्लिम पार्षद चुने गए थे। इनमें ज्यादातर कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवार थे। शहर के कई वार्डों में मुस्लिम मतदाता चुनाव का नतीजा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस बार भी इन वार्डों पर सभी राजनीतिक दलों की खास नजर है।