भास्कर न्यूज| जैसलमेर कुशल कल्पतरू वर्षावास की व्याख्यान माला के तहत धर्मसभा को संबोधित करते हुए खरतरगच्छाचार्य जिन मनोज्ञ सूरीश्वर महाराज ने णमुत्थुणं सूत्र की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि इस दिव्य सूत्र की रचना सौधर्मा इंद्र ने की है। आचार्य ने बताया कि तीर्थंकर परमात्मा के जन्म आदि कल्याणक के अवसर पर सौधर्मा इंद्र अपने आसन से उठकर सात कदम आगे बढ़ते हैं। वे इसी सूत्र के माध्यम से अरिहंत परमात्मा की वंदना करते हैं। इस सूत्र में अरिहंत भगवंतों के दिव्य गुणों की महत्ता बताई गई है। सूत्र में परमात्मा को तीर्थ का स्थापक, स्वयं बोध प्राप्त करने वाले, पुरुषों में उत्तम, पुरुषों में सिंह के समान निर्भीक तथा गंध हस्ती स्वरूप निरूपित किया गया है। तीर्थंकर लोक में श्रेष्ठ, लोकहितैषी तथा लोक में धर्म का प्रकाश फैलाने वाले धर्म चक्रवर्ती हैं। इस सूत्र के जरिए भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्य काल के सभी तीर्थंकरों को भावपूर्वक वंदन किया गया है। धर्मसभा में मुनि नयज्ञसागर महाराज ने कहा कि ललित विस्तरा ग्रंथ में णमुत्थुणं सूत्र की सूक्ष्म से सूक्ष्म व्याख्या मिलती है। परमात्मा की भाव पूजा के रूप में किए जाने वाले चैत्यवंदन में मूल रूप से इसी सूत्र का पठन किया जाता है। प्रतिदिन के पूजन का लाभ पुखराज नेतमल भंसाली परिवार, बाड़मेर, एवं माडुदेवी राणामल डूंगरवाल देवड़ा परिवार, जैसलमेर, द्वारा लिया गया।