भक्ति आंदोलन के दौरान सगुण भक्ति में कृष्ण को पति स्वरूप मानने वाली मीराबाई की भक्ति और समर्पण का प्रतीक रही ‘मुरलीधर जी’ की मूर्ति के दर्शन भास्कर आपको करवा रहा है। काले मार्बल की 14 इंच की ये प्रतिमा मेड़तिया वंश के पूर्व ठिकाने पाली जिले के घाणेराव महल में आज भी सुरक्षित है। महल की जनाना ड्योढ़ी के प्राचीन मंदिर में मीरा के कृष्ण यानी मुरलीधर की मूर्ति की नित्य पूजा हो रही है। घाणेराव की पूर्व ठकुरानी और इतिहासकार सरिता कुमारी बताती हैं कि कृष्ण जी के प्रति मीरा के प्रेम की छोटी सी कहानी है। जब मीरा लगभग पांच साल की थीं, तो उन्होंने रावला (महल) के पास से गुजरती हुई एक बारात देखी और मासूमियत से अपनी मां से पूछा, ‘म्हारो बिंद कठै?’ यानी मेरा पति कहां है? मां ने कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘व्है है’ यानी वे रहे। वे शब्द मीरा के आध्यात्मिक जीवन की नींव बन गए। तब से, उन्होंने कृष्ण को अपना दिव्य दूल्हा और खुद को उनकी समर्पित दुल्हन माना। मान्यता है कि वह इस पवित्र मूर्ति को अपने पास रखती थीं और सन 1516 में शादी के बाद उसे चित्तौड़ ले गईं। उनकी शादी बहुत कम समय की रही। युद्ध में घायल हुए उनके पति कुंवर भोजराज की 1521 में मृत्यु हो गई। मीरा सती नहीं हुईं। 1527 में खानवा के युद्ध में मीरा के पिता राव रतन सिंह शहीद हो गए। वैराग्य पथ पर वृंदावन जाने से पहले उन्होंने अपने चचेरे भाई ठाकुर प्रतापसिंह को प्रतिमा सौंप दी। वे 1928 में नाडोल और फिर घाणेराव गए। वहां महल की जनाना ड्योढ़ी के मंदिर में मूर्ति स्थापित की, जहां यह मुरलीधर जी के नाम से जानी गई। हर साल जन्माष्टमी पर यहां मेला लगता है।