निकाय चुनावों में भाजपा व कांग्रेस का डैमेज कंट्रोल पूरी तरह सफल नहीं हो सका। नामांकन वापसी के अंतिम दिन सैकड़ों बागी मैदान में डटे रहे। इन बागियों से पार्टियों के अधिकृत प्रत्याशियों को सीधा खतरा है। भाजपा जहां 1000 से अधिक बागियों को बैठाने में कामयाब रही, वहीं 450 से अधिक बागी अब भी डटे हुए हैं। इसी तरह कांग्रेस 432 बागियों पर काबू पाने में सफल रही, लेकिन 610 बागी मैदान छोड़ने को तैयार नहीं हुए। भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने बगावत रोकने के लिए बड़े स्तर पर मान-मनौव्वल की, लेकिन सभी बागियों को राजी नहीं कर पाए। नामांकन वापसी की समय-सीमा खत्म होने के बाद अब पार्टी की रणनीति बागियों को चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने से रोकने और अधिकृत प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने की है। भाजपा ने बगावत पर कंट्रोल की जिम्मेदारी विधायक, विधायक प्रत्याशी, जिला अध्यक्ष और प्रभारी को दे रखी है। आरएलपी ने एक हजार प्रत्याशी उतारे: निकाय चुनावों में सांसद हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी ने एक हजार से अधिक प्रत्याशी उतारे हैं। ये पिछली बार की तुलना में आठ गुना से अधिक है। पिछली बार सवा सौ टिकट दिए थे। पार्टी सुप्रीमो बेनीवाल ने कहा कि एक हजार प्रत्याशियों का मैदान में उतरना इस बात का प्रमाण है कि जनता मजबूत तीसरे राजनीतिक विकल्प की ओर देख रही है। रिपोर्ट तलब, चुनाव बाद होगी कार्रवाई नामांकन वापसी का मौका निकलने के बाद भाजपा संगठन ने अब बागियों का पूरा रिकॉर्ड जुटाना शुरू कर दिया है। प्रदेश नेतृत्व ने सभी जिलाध्यक्षों और प्रभारियों से बागी प्रत्याशियों की सूची मांगी है। इसमें यह भी जानकारी जुटाई जा रही है कि किस निकाय में कौन बागी मैदान में है और उसका स्थानीय प्रभाव कितना है। परिणाम के बाद पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ने और उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाने वालों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होना तय है। आचार संहिता तोड़ी तो होगा एक्शन राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह की अध्यक्षता में गुरुवार को सचिवालय में पर्यवेक्षकों की प्रशिक्षण बैठक हुई। सिंह ने पर्यवेक्षकों को निर्वाचन प्रक्रिया पर सतत निगरानी रखने और स्थानीय अधिकारियों के साथ प्रभावी समन्वय के निर्देश दिए। पर्यवेक्षण दो चरणों में होगा। पहला चरण 7 से 14 सितंबर तक सदस्य पद की मतगणना पूरी होने तक रहेगा। दूसरा चरण 21 से 22 सितंबर तक अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के निर्वाचन तक चलेगा। बगावत से कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय भाजपा के अंदरूनी आकलन के मुताबिक, बागियों की मौजूदगी का सबसे ज्यादा असर उन निकायों और वार्डों में हो सकता है, जहां टिकट कटने से नाराज पुराने कार्यकर्ता निर्दलीय के रूप में मैदान में उतर गए हैं। इनमें कई ऐसे चेहरे भी हैं, जिनकी स्थानीय स्तर पर व्यक्तिगत पकड़ और कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव है। भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ बागियों की संख्या नहीं, बल्कि यह भी है कि इनमें से कितने प्रत्याशी पार्टी के परंपरागत वोट में सेंध लगा पाते हैं।