गरीब घरों में दिव्यांगता संसाधनों के अभाव में एक अभिशाप बन जाती है। जागरूकता की कमी और दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद के बीच विशेष बच्चों का इलाज और पढ़ना-लिखना तो दूर, उनका घर से बाहर निकलना भी मुश्किल होता है। उदयपुर के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय (रेलवे ट्रेनिंग) में कार्यरत शिक्षक दुर्गाराम मुवाल ने इन बेसहारा और दृष्टिबाधित बेटियों के जीवन में जो उजाला बिखेरा है, उसकी दास्तां दिल छूने वाली है। बिना किसी सरकारी फंडिंग या बाहरी मदद के, दुर्गाराम अकेले ही अपनी सरकारी सैलरी, पर्सनल बैंक लोन और बीमा पॉलिसियों के पैसों से इन बेटियों के लिए एक अनूठा आवासीय हॉस्टल चला रहे हैं। कुपोषण और दर्द के दलदल से खींचकर लाई गई बेटियां इस हॉस्टल में रहने वाली हर एक बच्ची की कहानी संघर्ष और लाचारी की एक दर्दनाक दास्तां है, जिसे शिक्षक दुर्गाराम ने अपनी ममता और जिद से बदल दिया है। 6 साल की कुपोषित सुमन को जब दुर्गाराम उदयपुर लाए, तो वह महज तीन साल की लगती थी। दो साल की उम्र में बीमारी से आंखों की रोशनी गंवा चुकी सुमन गंभीर कुपोषण का शिकार थी। खाने को कुछ नहीं था, तन पर फटे कपड़े और पैरों में चप्पल तक नहीं थी। लेकिन दुर्गाराम के हॉस्टल में मिलने वाली अच्छी खुराक और प्यार ने उसे नई जिंदगी दी। आज 4 महीने के भीतर ही वह ब्रेल लिपि सीख रही है, अंग्रेजी में गिनती बोल लेती है और रोजाना तैराकी सीखने जाती है। इसी तरह छह साल की पूनम भी जन्मजात दृष्टिबाधित और कुपोषित थी। सिर में एक छोटी सी फुंसी उठी थी जिस पर गरीब परिजनों का ध्यान नहीं गया। देखते ही देखते वह नासूर बन गई, सिर में कीड़े पड़ गए और इलाज के बाद उसके सिर के बाल तक झड़ गए। पिता उसे मदद के लिए ग्रामीण शिविरों में लेकर भटके, लेकिन जब कहीं आस नहीं मिली तो एक अन्य शिक्षक के जरिए दुर्गाराम तक यह खबर पहुंची। दुर्गाराम खुद उसके घर गए, परिजनों की काउंसलिंग की और उसे खींच लाए इस सुरक्षित आंचल में। चारदीवारी की कैद और मजदूरी से मुक्ति दिलाई 11 साल की ललिता जन्मजात दृष्टिबाधित है। परिवार को डर रहता था कि कहीं बच्ची खो न जाए या उसके साथ कोई अनहोनी न हो जाए, इसलिए वे उसे ताला लगाकर हमेशा घर के अंदर ही कैद रखते थे। वहीं 13 साल की रिंकू की देखभाल के चक्कर में उसके माता-पिता चाहकर भी मजदूरी पर नहीं जा पाते थे। दुर्गाराम ने इन दोनों को उस घुटन भरी कैद से आजाद कराकर स्कूल में दाखिला दिलाया। दुर्गाराम के इस समर्पण की गूंज अब राजस्थान की सीमाओं को पार कर दूसरे राज्यों तक पहुंच चुकी है। बिहार के गोपालगंज की टुन्नी और मुन्नी जब इस हॉस्टल में पहुंचीं, तो टुन्नी के हालात ऐसे थे कि दृष्टिबाधित होने के बावजूद उसे पेट भरने के लिए मजदूरी करनी पड़ती थी। आज वे यहां सुरक्षित माहौल में रहकर अपने सपनों को जी रही हैं। नहीं मिलती कहीं से मदद, पूरा खर्च खुद उठाते हैं वर्तमान में इस हॉस्टल में सुमित्रा, एंजिल, टुन्नी, मुन्नी, कुरी, रिंकू, प्रमिला, ललिता, मंशा, ज्ञाना, सुमन और पूनम सहित कुल 12 बेटियां रह रही हैं। इसके अलावा 10 दृष्टिबाधित लड़कों को भी उन्होंने अलग आवासीय विद्यालयों में दाखिल कराया है। इन सबके अलावा दुर्गाराम के सेवा कार्यों में ऐसे कई मार्मिक मामले भी जुड़े हैं, जिनमें पोलियो या पैरालिसिस से जकड़े सगे भाई-बहन शामिल हैं। 25,000 रुपये महीने का हॉस्टल का किराया, वार्डन का खर्च, बच्चों को लाने-ले जाने के लिए ऑटो का किराया और उनकी पढ़ाई का पूरा जिम्मा दुर्गाराम अकेले अपने कंधों पर उठाए हुए हैं। उनका परिवार गांव में रहता है, जो उन्हें मानसिक संबल तो देता है, लेकिन आर्थिक बोझ वे अकेले ही झेलते हैं। वे कहते हैं, ‘सरकार को सब पता है, लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं है। मैं अपनी सैलरी से जितना हो सकता है, इन बच्चों के लिए करता हूं। मेरी इच्छा है कि इन्हें कॉलेज तक पढ़ाकर इनके पैरों पर खड़ा कर दूं, ताकि ये दुनिया के आगे कभी लाचार न महसूस करें’। अंधकार में डूबी इन बेटियों के जीवन में दुर्गाराम मुवाल सिर्फ एक शिक्षक नहीं, बल्कि वह फरिश्ता हैं जिन्होंने अपने कर्ज और वेतन की परवाह किए बिना इनकी जिंदगी में उम्मीद का एक ऐसा सवेरा लिख दिया है, जो कभी बुझ नहीं सकता।