राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग का किडनैप और गैंगरेप के मामले में चार आरोपियों की सजा रद्द कर बरी कर दिया है। जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। अलवर की पॉक्सो कोर्ट ने 2 जून 2023 को चारों को अंतिम सांस तक जेल की सजा सुनाई थी। आरोपियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने मामले में जांच अधिकारी अंजलि अजीत जोतवाल और पूरी पुलिस टीम पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस ने इस संवेदनशील मामले की इन्वेस्टिगेशन बेहद लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से की। पुलिस ने सबूतों को सुरक्षित रखने के बजाय कानूनी प्रक्रियाओं का मजाक बना दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की इन गलतियों ने अभियोजन पक्ष की कहानी में कई ऐसे बड़े गेप छोड़ दिए हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है। इस मामले में हाईकोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद 14 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। वहीं, 26 अक्टूबर को फैसले का ऑपरेटिव पार्ट सुनाते हुए बुधवार को डिटेल फैसला जारी किया गया। अब जानिए किस आधार पर किया बरी हाईकोर्ट ने फैसले मे कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को 'संदेह से परे' साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने पीड़िता के बयानों में विरोधाभास, एफएसएल और डीएनए रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह और पीड़िता के नाबालिग साबित नहीं होने के आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया। पीड़िता ने बार-बार बयान बदले हाईकोर्ट ने कहा कि- इस मामले में पीड़िता की खुद की गवाही कानून की नजर में बेदाग और पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं है। लिखित शिकायत में पीड़िता ने बाड़े और नदी के पास सुनसान जगह पर गैंगरेप की बात कही थी। लेकिन कोर्ट में पीड़िता ने कहा कि बाड़े में रेप नहीं हुआ, सिर्फ चलती गाड़ी में रेप हुआ। पहले कहा गया कि चारों आरोपियों ने एक साथ रेप किया, फिर बयान बदलकर पीड़िता ने कहा कि पहले दो ने रेप किया और फिर दो अन्य शामिल हुए। कोर्ट ने पाया कि लड़की अपनी मर्जी से बिना किसी शोर-शराबे के रात साढ़े 10 बजे घर से बाहर आई थी, इसलिए अपहरण का मामला भी साबित नहीं होता है। मेडिकल सबूतों में स्पष्ट रेप की पुष्टि नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों के मुताबिक पीड़िता के शरीर पर चोट का कोई ताजा निशान नहीं था। प्राइवेट पार्ट में मामूली खरोंच थी। इसे डॉक्टर ने स्वीकार किया कि वह पीरियड्स के दौरान सेनेटरी पैड के कारण भी हो सकती है। वहीं, सबसे बड़ी बात प्राइवेट पार्ट पर कोई सीमन नहीं पाया गया। इसके आधार पर डॉक्टर ने राय दी थी कि रेप नहीं हुआ है। पुलिस ने सैंपल की सुरक्षित चैन नहीं रखी अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता के कपड़ों और कार की सीट से मिले मिक्स डीएनए प्रोफाइल आरोपियों के खून के नमूनों से मेल खा रहे थे। इसके अलावा डीएनए रिपोर्ट तैयार करने वाले वैज्ञानिक विशेषज्ञों को गवाह के तौर पर कोर्ट में पेश नहीं किया गया। इससे रिपोर्ट का कानूनी मूल्य संदिग्ध हो गया। एफआईआर के समय और सत्यता पर सवाल पीड़िता ने बयानों में कहा कि घटना के तुरंत बाद वह रात करीब 2 बजे पुलिस चौकी गई और वहां शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने चौकी की वह पहली शिकायत या रोजनामचा रिकॉर्ड ही कोर्ट में पेश नहीं किया। एफआईआर अगले दिन सुबह सुबह 9. 34 बजे दर्ज दिखाई गई, लेकिन वह मजिस्ट्रेट कोर्ट तक लगभग 3 महीने की देरी से 24 दिसंबर 2019 को पहुंची। जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। कोर्ट ने माना कि पुलिस ने मामले की असली शुरुआत को छुपाया है और एफआईआर बाद में सोच-समझकर तैयार किया गया दस्तावेज प्रतीत होती है। पीड़िता का नाबालिग साबित नहीं हो पाना अभियोजन पक्ष ने 10वीं की मार्कशीट के आधार पर दावा किया था कि कि घटना के वक्त पीड़िता की उम्र 17 साल से कम थी। पीड़िता के पिता, जिन्होंने एडमिशन फॉर्म भरा था अथवा स्कूल के हेडमास्टर को गवाह के तौर पर कोर्ट में पेश नहीं किया गया, जिससे बर्थ डेट का पुख्ता आधार साबित हो सके। वहीं, पीड़िता की मां ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में माना कि जब लड़की पहली बार स्कूल गई तो उसकी उम्र 10-12 साल के करीब थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में बुरी तरह विफल रहा कि पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी। करीब 7 साल पहले हुई थी घटना अलवर जिले के एक पुलिस थाने में दर्ज मामले के अनुसार, 27 सितंबर 2019 की रात करीब साढ़े 10 बजे चार आरोपी पीड़िता को उसके घर से कार में ले गए थे। पहले गांव के पास बने एक बाड़े में और फिर गांव की नदी के पास सुनसान जगह पर ले जाकर गैंगरेप किया था। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि घटना का वीडियो शेयर करने और परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी गई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार- घटना के बाद उसे घर के पास छोड़ दिया गया। उसके बाद वह पुलिस चौकी पहुंची और शिकायत दर्ज करवाई थी।