यूनेस्को ने परकोटे की हवेलियां टूटने, हेरिटेज असेसमेंट अधूरा रहने और संरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए। राजस्थान हाईकोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लेकर अवैध निर्माणों का सर्वे और जिम्मेदार अधिकारियों का ब्योरा मांगा। इन सख्त टिप्पणियों के बीच भास्कर ने जयपुर की हेरिटेज इमारतों के बाहरी स्वरूप का ग्राउंड ऑडिट किया तो सवाल केवल अवैध निर्माणों का नहीं, विरासत की पहचान बदलने का भी सामने आया। परकोटे के चौड़ा रास्ता, त्रिपोलिया, चांदपोल, जौहरी बाजार, गणगौरी बाजार, रामगंज, घाटगेट और किशनपोल की पहचान जिस एकरूप ‘जयपुरी लाल’ रंग और स्थापत्य से है, वह कई जगह बदल चुका है। कहीं भवनों के सामने करौली का लाल पत्थर लगा दिया गया तो कहीं मकराना का सफेद मार्बल। कई जगह सीमेंट प्लास्टर पर हल्का गुलाबी रंग करके औपचारिकता पूरी कर दी गई। सवाल यह है कि जब फसाड, रंग और मूल स्थापत्य स्वरूप को बचाने के नियम पहले से मौजूद हैं तो ये बदलाव किसकी अनुमति से हुए? अनुमति नहीं ली गई तो निगरानी करने वाली एजेंसियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की? सिर्फ रंग नहीं बदल रहा, पूरी स्थापत्य पट्टी टूट रही परकोटे की विरासत केवल दीवारों के रंग से नहीं बनती। बाजारों की कतारबद्ध इमारतें, बरामदे, मेहराब, झरोखे, जालियां, रेलिंग और पुराने दरवाजे मिलकर एक समान स्थापत्य दृश्य बनाते हैं। किसी एक इमारत पर अलग पत्थर, मार्बल या आधुनिक फसाड लगाने से पूरी बाजार पट्टी की एकरूपता प्रभावित होती है। नगर निगम के बिल्डिंग बायलॉज और विरासत संरक्षण प्रावधानों में जीर्णोद्धार के दौरान मूल स्वरूप बनाए रखने की व्यवस्था है। इसके बावजूद मौके पर अलग-अलग सामग्री और रंग दिखाई दे रहे हैं। इससे यह सवाल भी उठता है कि जीर्णोद्धार की अनुमति देने के बाद अधिकारी मौके पर यह जांच कर रहे हैं या नहीं कि स्वीकृत डिजाइन के मुताबिक ही काम हुआ। एमआई रोड पर भी पहचान बदल गई एमआई रोड की पुरानी स्थापत्य पहचान पीले रंग से रही है। अब इसी सड़क पर कई भवनों के सामने काला, नीला और भूरा रंग दिखाई देता है। कुछ इमारतों का बाहरी स्वरूप भी आसपास की पारंपरिक वास्तु से अलग हो चुका है। ऐसे में सवाल यह है कि जिस सड़क की दृश्य एकरूपता शहर की पहचान का हिस्सा रही, वहां रंग और फसाड बदलते गए तो जेडीए और नगर निगम की मॉनिटरिंग कहां थी? नियम हैं, मूल स्वरूप वापस कराने का भी प्रावधान रिटायर्ड एडिशनल चीफ टाउन प्लानर चंद्रशेखर पाराशर बताते हैं कि परकोटे के लिए वर्ष 1982 में रंग का कोड तय किया गया था। इसे ‘हिरमीची’, यानी अंग्रेजी में ब्रिक ब्राउन कहा जाता था। एमआई रोड के परंपरागत पीले रंग को ‘राम रज’ कहा जाता था। शहर के कई प्रशासनिक भवनों में भी यही पीला रंग रखा गया था। जयपुर को वर्ष 2019 में विश्व धरोहर शहर का दर्जा इसकी सुनियोजित बनावट, वास्तु और एकरूपता के कारण मिला। परकोटा और उससे जुड़ा बफर जोन भी संरक्षण व्यवस्था का हिस्सा है। जोरावर सिंह गेट से आमेर तक का क्षेत्र बफर जोन में आता है। जयपुर की विरासत संरक्षण उपविधि-2020 में मुख्य बाजारों की इमारतों के सामने के हिस्से, मेहराब, जाली, झरोखे, रेलिंग और रंग योजना के लिए स्थापत्य नियंत्रण दिशा-निर्देशों का पालन जरूरी है। नियमों के विपरीत बदलाव मिलने पर नोटिस देकर 60 दिन में मूल स्वरूप बहाल कराने का प्रावधान है।