बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरे पर डीग के मेला मैदान में 45 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया। रावण दहन के साथ ही मैदान में मौजूद लोगों को सत्य, धर्म और अच्छाई के रास्ते पर चलने का संदेश मिला। इस आयोजन की खास बात यह रही कि रावण का पुतला तैयार करने के पीछे मथुरिया परिवार की कई पीढ़ियों की मेहनत और पारंपरिक हुनर जुड़ा है। यह परिवार पिछले चार-पांच पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। परिवार के सदस्य सुरेंद्र सिंह, बबलू, सिकंदर और गुलशन कुमार सहित अन्य लोग इस काम में जुड़े हैं। परिवार के लोग अपने अनुभव और मेहनत से हर साल रावण के पुतले को आकार देते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सीखी गई यह कला अब परिवार की पहचान बन चुकी है। रावण का पुतला तैयार करने में उसकी बनावट, आकार और सजावट का ध्यान रखा जाता है। इसके पीछे कई दिनों की मेहनत और अनुभव होता है। परिवार के सदस्य इस पारंपरिक काम के जरिए दशहरे के आयोजन को खास बनाने में योगदान देते हैं। दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। रामायण की मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण का वध कर माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया था। इसी विजय की याद में दशहरे पर रावण दहन किया जाता है। यह पर्व अहंकार, अन्याय और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है। दशहरे से जुड़ी एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा ने नौ दिनों के युद्ध के बाद महिषासुर का वध किया था। इसी कारण देश के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी को विभिन्न परंपराओं के साथ मनाया जाता है। डीग में 45 फीट के रावण के दहन के साथ लोगों को यह संदेश मिला कि अहंकार और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंत में जीत सत्य और अच्छाई की होती है। वहीं, मथुरिया परिवार की चार-पांच पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा इस बात की मिसाल है कि पारंपरिक कला और हुनर को मेहनत से अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।