नीट यूजी-2026 काउंसलिंग के स्ट्रे राउंड की जारी संशोधित अंतिम सीट आवंटन सूची ने देश की चिकित्सा शिक्षा की जमीनी सच्चाई सामने रख दी है। कुल 3,108 सीटों के विश्लेषण से साफ है कि सरकारी सीटों का दायरा बेहद सीमित है, जबकि निजी कॉलेजों की स्व-वित्तपोषित (सेल्फ-फाइनेंस) सीटें हावी हैं। सूची की शुरुआती 1,521 सीटें (लगभग 1.45 लाख रैंक तक) सरकारी व केंद्रीय कोटे की थीं, जबकि इसके बाद की पूरी सूची निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों की स्व-वित्तपोषित सीटों से भरी है, जो कुल आवंटन का 46.2 प्रतिशत (1,436 सीटें) हिस्सा हैं। 46.2% सीटें स्व-वित्तपोषित: 71.4% ओबीसी मेधावियों ने ओपन सीटों पर जमाया कब्जा कुल 3,108 आवंटनों में एमबीबीएस की 2,589 (83.3%), बीडीएस की 405 (13.0%) और बी.एससी. नर्सिंग की 114 (3.7%) सीटें शामिल हैं। सरकारी एमबीबीएस व दंत चिकित्सा के लिए ऑल इंडिया कोटे में 1,421 और ओपन सीट कोटे में 77 सीटें आवंटित हुईं। दिव्यांग-रहित सरकारी एमबीबीएस सीटों में ओपन वर्ग की सीटें 3,782 से शुरू होकर 28,515 रैंक पर बंद हुईं। इसी तरह ओबीसी की सीटें 5,250 से 28,601, ईडब्ल्यूएस की 6,071 से 31,430, एससी की 65,933 से 1,27,165 और एसटी की सीटें 89,347 से 1,44,533 रैंक पर क्लोज हुईं। एम्स के विभिन्न परिसरों में 41 और जिपमेर कराईकल में 9 सीटें आवंटित हुईं, जहां शीर्ष 3,782 रैंक पर एम्स भुवनेश्वर मिला। आरक्षित वर्ग का शानदार प्रदर्शन आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों ने सामान्य (ओपन) सीटों पर अपनी मेधा का परचम लहराया। 1,345 ओबीसी उम्मीदवारों में से 960 (71.4%), 212 ईडब्ल्यूएस में से 86 (40.6%), 427 एससी में से 163 (38.2%) और 162 एसटी उम्मीदवारों में से 39 (24.1%) ने ओपन कैटेगरी की सीटों पर बाजी मारी। प्राइवेट सेक्टर : तमिलनाडु-पुडुचेरी की 33% हिस्सेदारी आवंटित कुल एमबीबीएस सीटों में स्व-वित्तपोषित सीटों की हिस्सेदारी 51.5% (1,436 सीटें) है। अकेले तमिलनाडु (717) और पुडुचेरी (316) मिलकर कुल सूची का 33.2% हिस्सा संभालते हैं, जिनमें से 85% सीटें स्व-वित्तपोषित हैं। शीर्ष सात निजी संस्थानों (श्री लक्ष्मी नारायण, विनायक मिशन, श्रीनिवासन, भारत मेडिकल कॉलेज, धनलक्ष्मी श्रीनिवासन, जेआर मेडिकल और वेल्स मेडिकल कॉलेज) ने अकेले 700 सीटें हासिल कीं। सूची में सबसे निचले पायदान यानी 11,90,352 रैंक वाले अंतिम छात्र को भारत मेडिकल कॉलेज चेन्नई में स्व-वित्तपोषित एमबीबीएस सीट मिली। वहीं दस्तावेजों में 25 पंक्तियों में ‘जीएन-यस’ श्रेणी (संभवतः दिव्यांग सामान्य अभ्यर्थी) दर्ज पाई गई। इससे साफ होता है कि नीट में सिर्फ अच्छी रैंक ही नहीं, बल्कि मेडिकल करियर के लिए वित्तीय प्रबंधन भी व्यावहारिक सच बन चुका है। देव शर्मा, एजुकेशनिस्ट