जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) से संरक्षण की दुनिया की सबसे बड़ी और सुखद खबर सामने आई है। विलुप्ति की कगार पर खड़े राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) को बचाने की जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। अब तक जिन पक्षियों को इंसानी देखरेख और AI (कृत्रिम प्रजनन) के भरोसे पाला जा रहा था, उन्होंने अब खुद जिम्मेदारी संभाल ली है। इस साल 11 नए चूजों का जन्म हुआ है, जिनमें से 3 'नेचुरल मैटिंग' के जरिए पैदा हुए हैं। यानी अब ये पक्षी खुद अपनी आबादी बढ़ाने में सक्षम हो गए हैं। अब जंगल से अंडे लाने की जरूरत नहीं संरक्षण कार्यक्रम के चौथे सेशन में यह सबसे अहम बदलाव है। अब तक पूरा फोकस जंगल से लाए गए अंडों पर था, लेकिन अब संरक्षण केंद्रों (रामदेवरा और सुदासरी) में मौजूद पक्षी खुद जोड़े बनाकर अंडे दे रहे हैं। जल्द खुले आसमान में भरेंगे उड़ान वन विभाग अब इन 79 गोडावणों को खुले वातावरण में छोड़ने की तैयारी कर रहा है। पहले माना जा रहा था कि बंदी प्रजनन वाले पक्षी बाहरी माहौल नहीं झेल पाएंगे, लेकिन चूजों की सेहत ने वैज्ञानिकों को भरोसा दिलाया है कि वे 'फ्रीडम' के लिए तैयार हैं। सुरक्षा का 'थार कवच' खुले जंगल में छोड़ने से पहले ग्रासलैंड में 'प्रिडेटर प्रूफ' (शिकारियों से सुरक्षित) बाड़े बनाए गए हैं। साथ ही हाई-टेंशन बिजली लाइनों पर विशेष 'बर्ड डाइवर्टर' लगाए गए हैं ताकि आसमान में भी ये सुरक्षित रह सकें। वैज्ञानिक अब सिर्फ केयरटेकर DFO बृजमोहन गुप्ता का कहना है- 2019 में जब सफर शुरू किया था तब चुनौती बड़ी थी। आज हमारे पास 33 संस्थापक पक्षियों के अलावा 46 ऐसे पक्षी हैं, जो यहीं पैदा हुए। सबसे बड़ी सफलता यह है कि अब वैज्ञानिक केवल केयरटेकर की भूमिका में हैं। पक्षी खुद पेरेंट्स की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अगर यही रफ्तार रही, तो अगले 5 साल में गोडावण सुरक्षित स्तर तक पहुंच जाएंगे। 3 पॉइंट्स में समझें क्यों अहम है यह उपलब्धि... नेचुरल ब्रीडिंग : इंसानी दखल के बिना अंडों से चूजे निकलना यह दर्शाता है कि पक्षी कैप्टिविटी में तनावमुक्त हैं। सर्वाइवल रेट : 11 नए चूजों का एक साथ आना संरक्षण टीम की बड़ी तकनीकी जीत है। ईको सिस्टम : गोडावण की बढ़ती संख्या थार के ग्रासलैंड ईको सिस्टम के स्वस्थ होने का प्रमाण है।