देश में कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर चल रही बहस के बीच अस्पतालों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल की कीमतों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेट (बीटी सेट), सीरिंज, कैथेटर और ग्लव्स जैसी जरूरी चीजों की खरीद दर और मरीज से कीमतों के मुकाबले 400 से 1300 फीसदी तक मार्जिन वसूली जा रही है। भास्कर ने डिस्ट्रीब्यूटर से इलाज में काम आने वाले सामान खरीदे तो खुलासा हुआ। ग्लव्स, सीरिंज और कैथेटर जैसी चीजें जरूरत के अनुसार दिन में दो से तीन बार तक इस्तेमाल की जा सकती हैं। इनकी कीमत भी इलाज के कुल खर्च में जुड़ती जाती है। दूसरी ओर, बड़े अस्पताल अस्पताल में एडमिट पेशेंट को ही दवा देते हैं। बाहर के डॉक्टर या किसी पर्चे पर दवा लेने जाता है तो उसे मना कर दिया जाता है। अस्पतालों का कहना है कि बाहर की दवा नकली हुई तो? कोल्ड चेन खराब हुआ तो? इंजेक्शन के रिएक्शन के बाद जिम्मेदार कौन होगा? भास्कर ने दवा चढ़ाने और मास्क जैसे सामान डिस्ट्रीब्यूटर से खरीदे, सवाल : लूट कब तक चलेगी केन्द्र सरकार और एनपीपीए रेट कंट्रोलिंग को लेकर काम कर रही है। कैंसर की दवाओं पर कंट्रोलिंग शुरू हो गई है। उम्मीद है कि अन्य पर भी ऐसा होगा। इसके अलावा एनपीपीए की ओर से भी पैनी नजर रखी जा रही है। हमारी ओर से भी निर्देश दिए जा रहे हैं कि ओवर बिलिंग नहीं हो। - अजय फाटक, ड्रग कंट्रोलर नियम का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो तभी रोक लगेगी दवाओं की डिस्ट्रीब्यूटर-कंपनी रेट और एमआरपी के बीच बड़ा अंतर गंभीर है। लेकिन यह रेट सरकारी नियमों एवं औषधि मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के तहत तय है। जिसमें अनेक स्तरों पर सुधार की आवश्यकता है। तो वह किया जाना चाहिए और यदि नियम पर्याप्त हैं, तो उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होना चाहिए। निष्पक्ष विश्लेषण और जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही तय कर मरीजों को राहत दी जा सकती है। डॉ. विजय कपूर, अध्यक्ष, निजी अस्पताल एसो.