एमबीएस में ड्रग विभाग ने पूरी की जांच कोटा एमबीएस अस्पताल में एल्बुमिन इंजेक्शन घोटाले में ड्रग विभाग की जांच में मांग-पत्रों के मैनेजमेंट और ट्रैक रिकॉर्ड संधारण में गड़बड़ी सामने आई है, जो इस महंगी दवा ‘लीकेज’ की सबसे बड़ी वजह बना। जांच टीम ने पाया कि अस्पताल में दवा मांग-पत्रों का कोई ट्रैक रिकॉर्ड ही नहीं है। किस नंबर की मांगपत्र बुक किस वार्ड में दी गई, वहां से किस-किस मांगपत्र क्रमांक पर किस मरीज को दवा लिखी गई? इस तरह का रिकॉर्ड रखने का कोई सिस्टम ही नहीं है। यदि ऐसा सिस्टम रखा होता तो शायद यह गड़बड़ी भी नहीं होती। यदि होती भी तो उसे पकड़ने में भी आसानी रहती। विभाग के मुताबिक कुछ दवा मांग-पत्रों की जांच कर ली गई है, ये मांगपत्र संबंधित वार्ड की बुक से कार्बन कॉपी सहित गायब मिले हैं, जबकि कुछ मांग-पत्रों का अब तक यही ट्रैस नहीं हो रहा कि वे कहां दिए गए थे। प्रत्येक मांगपत्र पर एक क्रमांक होता है, लेकिन इसका कहीं कोई रिकॉर्ड मेंटेन नहीं किया जाता है। घोटाले की जांच के लिए एडीसी प्रहलाद मीणा ने संयुक्त जांच समिति बनाई थी, जिसमें 5 अधिकारी लगाए गए थे। जांच टीम ने सिर्फ एक मरीज तक सीमित कर दी जांच मामले में 5 अधिकारियों ने हफ्तेभर तक जांच की, लेकिन जांच में सरकारी खजाने में लगी सेंध और उसके जिम्मेदारों तक पहुंचने की बजाय सिर्फ लीपापोती की गई। इन अधिकारियों ने जांच के नाम पर सिर्फ अस्पताल का रिकॉर्ड खंगाला और यहीं तक जांच सीमित करके अपनी रिपोर्ट तैयार कर दी, जबकि हकीकत में विभाग को अस्पताल से जारी किए गए एक-एक इंजेक्शन का सत्यापन करना था, जैसा पिछली बार हुए घोटाले में किया गया था। पूरी जांच सिर्फ एकमात्र उसी मरीज तक केंद्रित करके रखी गई, जिसका दैनिक भास्कर ने खुलासा किया था। अस्पताल के सूत्रों का कहना है कि यदि गहन जांच की जाए तो एक नहीं, दर्जनों फर्जी मरीज मिलेंगे, जो कभी अस्पताल में भर्ती ही नहीं हुए। जांच दल की सिफारिश, व्यवस्था में हो इस तरह के बदलाव : दवा मांगपत्र की प्रत्येक बुक स्टोर से जिस वार्ड के नाम जारी की जाए, वहां उसका रिकॉर्ड रखा जाए कि फलां क्रमांक से फलां क्रमांक तक की बुक संबंधित वार्ड इंचार्ज को दी गई। इसमें वार्ड इंचार्ज के नाम और वार्ड तक की सूचना हो। वार्ड इंचार्ज के स्तर से प्रत्येक मरीज को जब दवा मांगपत्र इश्यू किया जाए तो उसका भी संपूर्ण ब्योरा रखा जाए। हालांकि हर मरीज और हर दवा के मामले में ऐसा करना बड़ा जटिल हो सकता है, लेकिन महंगी दवाइयों और खासकर एल्बुमिन जैसे इंजेक्शन के मामले में इसका पूरा रिकॉर्ड रखा जाए कि कब, किस मरीज को मांगपत्र दिया गया। यह था मामला : भास्कर ने 9 अक्टूबर को इसका खुलासा किया था कि रामकन्या नाम की एक मरीज के नाम से अस्पताल से एल्बुमिन इंजेक्शन जारी किए जा रहे हैं, जबकि यह मरीज अस्पताल में कभी भर्ती ही नहीं हुई। भास्कर मरीज के घर पहुंचा तो स्वस्थ थी और घर पर ही आराम करती मिलीं। इस खुलासे के बाद नयापुरा पुलिस ने एक एफआईआर दर्ज की है, एसीबी ने भी मामले में संज्ञान लेते हुए परिवाद दर्ज करने की अनुशंसा मुख्यालय भेजी है।