डॉक्टर्स की 160 मरीजों पर स्टडी खेतों या घरों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक (ऑर्गेनोफास्फोरस) का जहर शरीर में जाने पर सांस लेने की मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं और वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। अस्पतालों के इमरजेंसी आईसीयू में सीमित वेंटिलेटर होने से यह तय करना चुनौतीपूर्ण होता है कि किस मरीज को वेंटिलेटर की प्राथमिकता दी जाए। अजमेर के जेएनएन मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स ने 160 मरीजों पर स्टडी कर इसका वैज्ञानिक समाधान खोजा है। स्टडी के मुताबिक खून में स्यूडोकोलिनेस्टरेज एंजाइम का टेस्ट करने से तुरंत पता चल जाएगा कि मरीज की स्थिति कितनी गंभीर है और उसे वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत है या नहीं। यह रिसर्च जर्नल ऑफ मॉडर्न मेडिसिन में प्रकाशित हुई है। दो साल तक मरीजों की स्टडी कर निष्कर्ष निकाला यह अध्ययन दो साल तक अजमेर मेडिकल कॉलेज में उन 160 मरीजों पर किया गया, जो ऑर्गेनोफास्फोरस के कन्फर्म केस थे। 29 मरीजों (18.13%) को मैकेनिकल वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता पड़ी। वेंटिलेटर पर रखे गए मरीजों में स्यूडोकोलिनेस्टरेज (PChE) एंजाइम का औसत स्तर काफी कम पाया गया। पेराडेनिया ऑर्गेनोफास्फोरस पॉइजनिंग (POP) स्केल पर मापी गई बीमारी की गंभीरता और PChE एंजाइम के स्तर में मजबूत विपरीत संबंध दर्ज किया गया। यानी एंजाइम का स्तर जितना कम होगा, मरीज की स्थिति उतनी ही गंभीर होगी। मरीज द्वारा निगले गए विष की मात्रा और वेंटिलेटर की जरूरत के बीच संबंध पाया गया। यानी जितना ज्यादा विष कंज्यूम किया गया, उसे वेंटिलेटर की जरूरत उतनी ही ज्यादा होगी। वेंटिलेटर की आवश्यकता वाले मरीजों में अतिरिक्त बायोमार्कर का स्तर भी काफी अधिक पाया गया। समय पर होगी हाई रिस्क मरीजों की पहचान : भर्ती के समय ही इस सिंपल ब्लड टेस्ट से डॉक्टर उच्च जोखिम वाले मरीजों की पहचान कर सकेंगे। इससे बिना समय गंवाए वेंटिलेटर और आईसीयू सपोर्ट की तैयारी की जा सकेगी, जिससे मरीजों की जान बचाने में मदद मिलेगी। यह अध्ययन डॉ. वीर बहादुर सिंह, डॉ. हरीश, डॉ. राकेश कुमार, डॉ. मयंक श्रीवास्तव, डॉ. रवि गौर, डॉ. सारांश सिंह और डॉ. इब्राहिम खान ने किया है। मेडिसिन के सीनियर प्रोफेसर डॉ. वीर बहादुर सिंह ने कहा - अभी डॉक्टर्स मैनुअल लक्षणों के आधार पर तय करते हैं स्यूडोकोलिनेस्टरेज एंजाइम ऐसे मरीजों में जीवनरक्षक है। यदि समय पर मरीज की पहचान हो जाए और उसे वेंटिलेटर मिल जाए तो काफी हद तक जानें बचाई जा सकेंगी। परंपरागत रूप से आंखों की पुतली की सिकुड़न, सांस में तकलीफ, शरीर का तापमान कम होना, हार्ट रेट, बेहोशी आदि लक्षणों के आधार पर वेंटिलेटर की जरूरत तय होती थी, लेकिन अब सिर्फ इस एक एंजाइम टेस्ट से सटीक तरीके से यह पता किया जा सकता है कि किस मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत है और किसे नहीं?