जालोर के 3 प्रमुख विरासत स्थल जालोर दुर्ग, तोपखाना और भाद्राजून की छतरियों में संरक्षण कार्य धीमी गति से चल रहा है, जबकि इन संरचनाओं में लगातार नुकसान बढ़ रहा है। ये तीनों स्मारक राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के अधीन हैं। कई जगह प्लास्टर झड़ रहा है, पत्थर टूट रहे हैं और दीवारों पर नाम लिखे जा रहे हैं। समय पर मरम्मत और संरक्षण नहीं होने से सदियों पुरानी ये ऐतिहासिक धरोहरें प्रभावित हो रही हैं। जालोर दुर्ग: 8वीं शताब्दी से जुड़ा इतिहास, मरम्मत रुकी जालोर दुर्ग का इतिहास 8वीं शताब्दी से जुड़ा है। इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा की पुस्तक के अनुसार इसकी नींव गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट ने रखी थी। बाद में परमारों ने इसका विस्तार किया और 12वीं शताब्दी में सोनगरा चौहानों ने इसे राजधानी बनाया। 1311 में अलाउद्दीन खिलजी ने जालोर पर हमला किया, जिसका उल्लेख कान्हड़दे प्रबंध और अमीर खुसरो के विवरण में मिलता है। दिल्ली सल्तनत के इतिहासकार हसन निजामी ने इसे हिंदुस्तान का अभेद्य दुर्ग बताया था। दुर्ग में सूरजपोल, ध्रुवपोल, चांदपोल और सिरेपोल जैसे चार मुख्य द्वार हैं। वर्तमान में किले की दीवारों पर कालिख और कोयले से नाम लिखे गए हैं। मुख्य पोलों से सीमेंट झड़ रहा है और कई जगह पत्थर टूट रहे हैं। करीब 8 महीने पहले किया गया प्लास्टर भी उखड़ रहा है और कई महीनों से मरम्मत कार्य बंद पड़ा है। स्वर्णगिरी-आठवीं शताब्दी का गौरव, कई महीने से मरम्मत बंद इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा की पुस्तक अर्ली चौहान डायनेस्टी के अनुसार 8वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट ने इसकी नींव रखी थी। बाद में 10वीं-11वीं शताब्दी परमारों ने इसका विस्तार किया और 12वीं शताब्दी में सोनगरा चौहानों ने इसे राजधानी बनाया। 1311 में खिलजी ने जालोर पर हमला किया। कान्हड़दे प्रबंध और अमीर खुसरो के विवरण इस युद्ध का उल्लेख है। दिल्ली सल्तनत के इतिहासकार हसन निजामी ने ताज-उल-मासिर में जालोर दुर्ग को हिंदुस्तान का अभेद्य दुर्ग बताया। सूरजपोल, ध्रुवपोल, चांदपोल और सिरेपोल जैसे 4 विशाल द्वार हैं। तोपखाना-संस्कृत के श्लोकों से लेकर तोपों की गूंज तक सफर तोपखाना केवल सैन्य इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि जालोर की प्राचीन विद्या परंपरा का भी साक्षी है। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार यह भवन मूल रूप से परमार राजा भोज के समय एक संस्कृत पाठशाला था, जहां वेद, शास्त्र और संस्कृत साहित्य की शिक्षा दी जाती थी। 1311 में अलाउद्दीन खिलजी के जालोर विजय के बाद इस भवन का स्वरूप बदल गया। खिलजी सेना ने संस्कृत पाठशाला को मस्जिद में बदल दिया। बाद के रियासती दौर में इसी भवन का उपयोग राठौड़ों ने शस्त्रागार और तोपखाने के रूप में किया। तोपें, बारूद, गोले व तलवारें रखी जाती थीं। भाद्राजून की छतरियां: पत्थरों में उकेरी राजपूती आन-बान-शान भाद्राजून की छतरियां 17वीं और 18वीं शताब्दी की स्थापत्य कला की मिसाल हैं। यहां 9 छतरियां हैं। इन छतरियों को स्थानीय लोग देवल भी कहते हैं। लाल और पीले पत्थरों से बनी इन संरचनाओं के स्तंभों, छज्जों और गुम्बदों पर बेहद बारीक नक्काशी की है। छतरियों पर उकेरे हाथी, घोड़े, कमल और सूर्य के चिह्न सूर्यवंशी परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। विशाल पत्थरों को इस तरह जोड़ा कि सदियों बाद भी ये संरचनाएं मजबूती से खड़ी हैं। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने इन्हें संरक्षित स्मारक घोषित किया। यह स्थल स्टेट आर्कियोलॉजी प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट की सूची में है। हमारी ओर से इसके संरक्षण को लेकर प्रयास जारी हैं विश्व विरासत दिक्स पर राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की ओर से प्रदेश के सभी राजकीय स्मारकों और संग्रहालयों में पर्यटकों के लिए प्रवेश पूरी तरह निशुल्क रहता है। जालोर जिले की छतरियां, किला और तोपखाने में शिलालेख लगा रखे है। इनके संरक्षण के प्रयास किए जा रहे है। इमरान अली, अधीक्षक, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, जोधपुर वृत