‘अवॉर्ड मिलना ऐसा है, जैसे अपने ही घर में प्यार मिल रहा हो, इज्जत मिल रही हो। जिस घर में जिंदगीभर यह संदेह बना रहता है कि मैं यहां स्वीकार किया गया हूं या नहीं, मैं कामयाब हुआ हूं या नहीं, वहां से मिलने वाला सम्मान इन सवालों का जवाब देता है'। बॉलीवुड गायक कैलाश खेर ने ये बातें दैनिक भास्कर के साथ विशेष बातचीत में कहीं। जयपुर के पूर्व राजपरिवार की ओर से आयोजित सवाई जयपुर अवॉर्ड समारोह में उन्हें महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस मौके पर उन्होंने अपने संघर्ष, संगीत के प्रति समाज की सोच, कलाकारों की संवेदनशीलता और जयपुर के पूर्व राजपरिवार के साथ अपने पुराने रिश्तों को याद किया। कैलाश खेर का कहना है कि भारत में किसी कलाकार की यात्रा आसान नहीं होती। सफलता मिलने से पहले उसे संदेह, अस्वीकृति और संघर्ष का सामना करना पड़ता है, लेकिन जब वही कलाकार अपनी पहचान बना लेता है तो उसे भरपूर प्यार और सम्मान भी मिलता है। उनके मुताबिक, यही भारतीय समाज की एक खास विशेषता है। हालांकि, कला के क्षेत्र में कलाकार को सफलता से पहले जिस मानसिक स्थिति से गुजरना पड़ता है, उस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। ‘देश पहले दुत्कारता है, फिर खूब लाड़ करता है’ कैलाश खेर ने कहा कि भारत में कलाकार को पहले अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कई बार उसे यह भी लगता है कि वह जिस काम को कर रहा है, क्या उसमें सफल हो पाएगा और क्या उसके अपने लोग उसे स्वीकार करेंगे। उन्होंने कहा कि भारत ऐसा देश है कि पहले आपको दुत्कारता है, धिक्कारता है, ललकारता है। फिर जब यह अपनाता है तो इतना लाड़ करता है, जो बेहद खास होता है। यह मेरे देश की विशेषता है। सफलता से पहले कलाकार को अपने परिवार और समाज के सामने भी अपनी उपयोगिता साबित करनी पड़ती है। विशेष रूप से संगीत और कला के क्षेत्र में यह स्थिति ज्यादा देखने को मिलती है। उन्होंने कहा कि जब तक किसी कलाकार को पहचान नहीं मिलती, तब तक उसके काम और भविष्य को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन जैसे ही वह सफल होता है, वही लोग उसकी उपलब्धियों पर गर्व करने लगते हैं। ‘पुरस्कार नए कपड़ों की तरह, पीछे छिपी होती हैं पुरानी यादें’ कैलाश खेर ने पुरस्कारों के महत्व को समझाते हुए कहा कि सम्मान मिलना कलाकार के लिए नए कपड़े मिलने जैसा है, लेकिन इन नए कपड़ों के पीछे संघर्ष के दिनों की पुरानी यादें होती हैं। जब कलाकार के पास कुछ नहीं होता, तब उसे मिलने वाला थोड़ा-सा प्यार, प्रोत्साहन और मान भी उसके लिए बहुत मायने रखता है। उन्होंने कहा कि कलाकार बेहद संवेदनशील होते हैं। उनके लिए सम्मान केवल मंच पर मिलने वाली ट्रॉफी या प्रशस्ति पत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उनके भीतर मौजूद उन सवालों को भी शांत करता है, जिनसे वे अपने संघर्ष के दिनों में जूझते हैं। किसी कलाकार को जब उसके काम के लिए स्वीकार किया जाता है तो उसका प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूसरे कलाकारों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। कैलाश खेर ने कहा कि सच्चे कलाकार और कला की कद्र होने से समाज में कला के प्रति सकारात्मक माहौल बनता है। इससे उन लोगों को भी प्रोत्साहन मिलता है, जो अभी अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ‘फिल्मी दुनिया और वास्तविक कला के बीच अंतर’ खेर ने कला और मनोरंजन की दुनिया के बीच अंतर पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत में उन्होंने दो तरह की दुनिया देखी है। एक फिल्मी दुनिया है, जो कई बार कृत्रिम नजर आती है, जबकि दूसरी वास्तविक कला की दुनिया है। इन दोनों के बीच इतना अंतर आ गया है कि आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वास्तविक कला क्या है। उन्होंने कहा कि कई बार लोग फिल्मी दुनिया में दिखाई देने वाली चीजों को ही कला का सही रूप मान लेते हैं। ऐसे में वास्तविक कलाकारों और उनकी साधना को पहचान मिलना जरूरी है। जब सच्ची कला और कलाकारों को सम्मान मिलता है तो उसका असर व्यापक होता है। इससे कला के दूसरे क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों का भी हौसला बढ़ता है और उन्हें अपनी प्रतिभा के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। ‘आज भी परिवार पूछता है-गाते-वाते तो हो, लेकिन काम क्या करते हो?’ कैलाश खेर ने कहा कि भारत में संगीत और कला को लेकर सामाजिक सोच में अभी भी बदलाव की जरूरत है। किसी परिवार में यदि कोई युवा संगीत सीखना चाहता है या गायन को अपना पेशा बनाना चाहता है तो उसे तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाता, जब तक वह सफल नहीं हो जाता। कई परिवारों में आज भी यह सवाल पूछा जाता है कि गाना गाते तो हो, लेकिन काम क्या करते हो? उन्होंने कहा कि लोगों को लगता है कि गायन या संगीत से जीवनयापन नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत, विदेशों में किसी व्यक्ति के गायक होने की बात पता चलने पर उत्साह के साथ प्रतिक्रिया दी जाती है। कैलाश खेर के अनुसार, वहां कला से जुड़े व्यक्ति को लेकर यह सोच भी दिखाई देती है कि कला उसके जीवन को बेहतर बना सकती है और वह अपने काम के जरिए दूसरों के जीवन में भी सकारात्मकता ला सकता है। उन्होंने कहा कि कला मनुष्य को अच्छे विचारों से जोड़ती है और उसे मानसिक रूप से बेहतर महसूस करने में मदद कर सकती है। उनके अनुसार, डॉक्टरों और दूसरे पेशों से जुड़े लोगों को भी तनाव का सामना करना पड़ता है। उन्होंने अपने परिचित डॉक्टरों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार दूसरों का उपचार करने वाले लोग भी खुद तनाव से जूझते हैं। ऐसे में संगीत और कला जीवन में सुकून और सकारात्मकता लाने का माध्यम बन सकते हैं। दीया कुमारी को सिखाया था संगीत सवाई जयपुर अवॉर्ड समारोह में सम्मानित होने के बाद कैलाश खेर ने जयपुर राजपरिवार के साथ अपने पुराने संबंधों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि संगीत जैसे क्षेत्र में सफलता मिलने से पहले कलाकार को अक्सर वह सम्मान नहीं मिलता, जिसकी उसे जरूरत होती है। लेकिन सफलता के बाद लोगों का व्यवहार बदल जाता है। उन्होंने कहा कि संगीत जैसे क्षेत्र में जब तक आप कामयाब नहीं होते, तब तक कोई आपको नमस्ते भी नहीं करता है। लेकिन आप सफल हो जाते हैं तो फिर कितने ही हाथ आपको सलाम के लिए उठने लगते हैं। जीवन के इस अनुभव से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि राजस्थान की उपमुख्यमंत्री और जयपुर राजपरिवार की सदस्य दीया कुमारी से भी उनका पुराना जुड़ाव रहा है। कैलाश खेर ने कहा कि वे दीया कुमारी को संगीत सिखाया करते थे। उन्होंने कहा कि जब वे लोगों को बताते हैं कि राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी ने उनसे संगीत सीखा है तो लोग इस बात पर खुशी जताते हैं। अब उन्हें भी यह बताते हुए अच्छा लगता है कि दीया कुमारी कभी उनकी शिष्या रही हैं। जब राजमाता पद्मिनी देवी ने कहा-तुम्हें कला में बहुत नाम कमाना है कैलाश खेर ने अपने संघर्ष के दिनों का एक भावुक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि जब सवाई भवानी सिंह ब्रुनेई में भारत के राजदूत थे, उस समय उन्हें जयपुर राजपरिवार का स्नेह मिला। उस दौर में वे खुद एक विद्यार्थी थे और उनका आत्मविश्वास भी बहुत मजबूत नहीं था। उन्हें अपने भविष्य को लेकर संदेह रहता था। उन्होंने बताया कि उस समय राजपरिवार ने उन्हें भावनात्मक संबल दिया। राजमाता पद्मिनी देवी से उनका विशेष जुड़ाव रहा। कैलाश खेर ने याद करते हुए कहा कि वे कभी-कभी उनसे कहते थे कि उन्हें अपने साथ ही रख लें। वे दीया कुमारी के साथ काम कर लेंगे। उस समय उन्हें खुद पर उतना भरोसा नहीं था, जितना राजमाता पद्मिनी देवी को उन पर था। पद्मिनी देवी ने उनसे कहा था कि उन्हें बहुत आगे जाना है और वे कला के क्षेत्र में बड़ा नाम कमाएंगे। उस समय जब वे खुद अपनी क्षमताओं को लेकर संदेह में थे, तब राजमाता का उन पर विश्वास उनके लिए बहुत मायने रखता था। उन्होंने कहा कि आज जब वे अपने करीब दो दशक के करियर को देखते हैं तो उस दौर का प्रोत्साहन याद आता है। दो हजार से अधिक कॉन्सर्ट, हजारों गानों का सफर कैलाश खेर ने अपने संगीत सफर का जिक्र करते हुए बताया कि वे अब तक करीब दो हजार कॉन्सर्ट कर चुके हैं और हजारों गाने गा चुके हैं। देश-विदेश में उनके कार्यक्रम लगातार होते रहते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि संगीत की यात्रा के शुरुआती वर्षों में ही उन्हें पद्मश्री सम्मान मिल गया था।