दुर्गा नवमी पर विशेष- साल में दो बार भरता है मेला दुर्गा नवमी के अवसर पर आज हम आपको हनुमानगढ़ से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक मां भद्रकाली मंदिर की महिमा से रूबरू करवा रहे हैं। भटनेर की प्राचीन धार्मिक विरासत से जुड़ा यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि करीब 550 साल पहले यहां मां भद्रकाली पिंडी के रूप में जमीन से प्रकट हुई थीं। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर को दर्शन दिए थे। मां की दुर्गा स्वरूप में पूजा-अर्चना होने के कारण नवरात्रों में मंदिर का विशेष महत्व रहता है। यहां चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र के दौरान वर्ष में दो बार विशाल मेले का आयोजन होता है। इन मेलों में राजस्थान के साथ पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। करीब 150 साल पहले बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिंह ने माता की मूर्ति की दोबारा स्थापना करवाई थी। वर्ष 1983 में पुरानी मूर्ति खंडित होने के बाद नई मूर्ति स्थापित की गई। अष्टधातु से निर्मित पुरानी मूर्ति की ऊंचाई सवा दो फीट थी। वर्तमान मूर्ति की ऊंचाई सवा तीन फीट है। इतिहास, लोकमान्यता और श्रद्धा का संगम यह मंदिर आज भी भक्तों की आस्था का प्रतीक बना हुआ है। हनुमानगढ़ के निकट स्थित मां भद्रकाली मंदिर का इतिहास प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और रोचक कथाओं से जुड़ा हुआ है। प्रचलित कथा के अनुसार, मुगल सम्राट अकबर अपनी सेना के साथ इस क्षेत्र से गुजर रहा था। अकबर को टीले पर एक बूढ़ी औरत दिखाई दी। जब अकबर ने उसके पास जाकर पानी मांगा, तो बूढ़ी माता ने मिट्टी का एक टुकड़ा हटाकर पानी निकालने को कहा। गड्ढे से जितना पानी निकाला गया, वह उतना ही भरा रहा। इसके बाद माता ने अकबर और उसकी सेना को भोजन भी करवाया, लेकिन भोजन समाप्त नहीं हुआ। इस चमत्कार से प्रभावित होकर अकबर ने माता से उनका नाम और सेवा के बारे में पूछा। तब माता ने स्वयं को भद्रकाली बताते हुए वहां मंदिर बनवाने का आदेश दिया।