अफीम की खेती करने वाले किसानों का लंबे समय से चल रहा इंतजार आखिर खत्म हो गया। केंद्र सरकार ने फसल साल 2026-27 के लिए नई अफीम नीति जारी कर दी है। इस बार नीति करीब डेढ़ महीने की देरी से आई, जिससे राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के अफीम उत्पादक इलाकों में किसान लगातार इसके इंतजार में थे। इस बार सरकार ने सबसे बड़ा बदलाव यह किया है कि इस साल लाइसेंस पाने के लिए किसानों को पहले से ज्यादा मॉर्फिन उत्पादन देना होगा। पिछले साल जहां 4.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मॉर्फिन देने वाले किसान पात्र थे, वहीं इस बार कम से कम 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मॉर्फिन जमा कराना जरूरी होगा। सितंबर की बजाय अक्टूबर में आई नीति अफीम की खेती करने वाले किसान हर साल सितंबर में नई नीति का इंतजार करते हैं। इसी के आधार पर खेत तैयार किए जाते हैं और आगे की प्रक्रिया शुरू होती है। पिछले साल सरकार ने सितंबर के पहले सप्ताह में ही नीति जारी कर दी थी, लेकिन इस बार किसानों को 24 अक्टूबर तक इंतजार करना पड़ा। ज्यादा मॉर्फिन उत्पादन जरूरी सरकार ने इस बार अगले साल लाइसेंस पाने के लिए जरूरी मॉर्फिन उत्पादन बढ़ा दिया है। जिन किसानों ने पिछले फसल वर्ष 2025-26 में कम से कम 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मॉर्फिन जमा कराया है, वे ही इस साल लांसिंग यानी चीरा लगाकर अफीम गोंद उत्पादन के लाइसेंस के लिए पात्र होंगे। पिछले साल यह सीमा 4.2 किलोग्राम थी। यानी इस बार किसानों को थोड़ा ज्यादा उत्पादन देना जरूरी हो गया है। सरकार का मानना है कि इससे अच्छी गुणवत्ता वाली खेती को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा जिन किसानों के मामले पहले अदालत या अपील में लंबित थे और अब उनके पक्ष में फैसला आया है, उन्हें भी राहत मिलेगी। मृतक किसानों के परिवारों के लिए भी नियम आसान किए गए हैं। अब कानूनी वारिस या पहले से नामित व्यक्ति को लाइसेंस लेने में पहले जैसी परेशानी नहीं होगी। पोस्त भूसा के लिए पांच साल तक राहत नई नीति में बिना चीरा लगाए केवल पोस्त भूसा उत्पादन करने वाले किसानों के लिए भी बड़ी राहत दी गई है। इस श्रेणी में पहली बार पात्र होने वाले किसानों को सीधे पांच साल तक का लाइसेंस मिलेगा। यानी फसल वर्ष 2030-31 तक उन्हें हर साल लाइसेंस नवीनीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी। इससे किसानों का समय भी बचेगा और बार-बार कागजी प्रक्रिया से भी राहत मिलेगी। हालांकि यह सुविधा उन्हीं किसानों को मिलेगी जो सभी नियमों का पालन करेंगे। अगर कोई किसान अवैध गतिविधियों में शामिल पाया जाता है या नियमों का गंभीर उल्लंघन करता है तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। जिन किसानों की पिछले साल पोस्त भूसे की उपज 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम रही थी, उनके लाइसेंस इस बार रोक दिए जाएंगे। हालांकि भविष्य में तय मानक पूरे करने पर उन्हें फिर से मौका मिल सकता है। लीज पर जमीन लेकर भी कर सकेंगे खेती खेती के रकबे को लेकर इस बार कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। अफीम गोंद उत्पादन करने वाले किसान को 0.10 हेक्टेयर और बिना चीरा लगाए पोस्त भूसा उत्पादन करने वाले किसान को 0.05 हेक्टेयर क्षेत्र का लाइसेंस मिलेगा। यह जमीन एक या एक से ज्यादा खसरा नंबरों में हो सकती है। अगर किसी किसान के पास तय रकबा पूरा नहीं है तो वह नियमों के अनुसार लीज पर जमीन लेकर भी खेती कर सकता है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर माप के दौरान पांच प्रतिशत तक रकबा ज्यादा निकलता है तो उसे सामान्य छूट के दायरे में माना जाएगा। इससे छोटी तकनीकी गलती के कारण किसानों को नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा। आवेदन की पूरी प्रक्रिया इस बार भी ऑनलाइन होगी। पात्र किसानों की सूची केंद्रीय स्वापक ब्यूरो की वेबसाइट और ऑनलाइन पोर्टल पर जारी की जाएगी। इसके साथ ही किसानों के मोबाइल पर भी सूचना भेजी जाएगी। जिन किसानों के दस्तावेज पहले से विभाग के पास उपलब्ध हैं, उन्हें वही कागज दोबारा जमा नहीं करने होंगे। किसानों को उत्पादन बढ़ाने पर देना होगा ध्यान सरकार ने इस नीति में सिर्फ इस साल के नियम नहीं बताए हैं, बल्कि चित्तौड़गढ़ अगले फसल वर्ष 2027-28 के लिए भी साफ संकेत दे दिए हैं। यानी इस बार की फसल ही अगले साल के लाइसेंस का आधार बनेगी। सरकार ने पहले से ही बता दिया है कि अगले साल लाइसेंस पाने के लिए किसानों को कम से कम 5.9 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मॉर्फिन उत्पादन देना होगा। वहीं बिना चीरा लगाए पोस्त भूसा उत्पादन करने वाले किसानों को 900 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन करना होगा। इससे साफ है कि आने वाले समय में अच्छी पैदावार देने वाले किसानों को ही प्राथमिकता मिलेगी। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को अब बेहतर बीज, समय पर सिंचाई, संतुलित खाद और वैज्ञानिक तरीके अपनाने होंगे।