कैंसर की दवा के मार्जिन को लेकर देशभर में बवाल मचा है। सुप्रीम कोर्ट ने दवा के अनियंत्रित दामों को डकैती और नरसंहार जैसा बताया। केन्द्र ने कोर्ट में कहा कि ट्रेड मार्जिन को MRP का 30% तक सीमित कर रहे हैं, महंगी दवा नहीं मिलेगी। इस बीच, भास्कर ने कैंसर की दवाएं खरीदीं... इनमें 1100% से 2583% तक मार्जिन वसूला गया। यानी 370 रुपए की दवा पर 11570 एमआरपी अंकित है, प्राइवेट हॉस्पिटल इसे 9762 रु. में बेच रहे हैं। भास्कर ने 24 दवा डिस्ट्रीब्यूटर और मरीजों को दी जाने वाली रेट निकाली, दवाएं खरीदीं, जो बहुत ज्यादा मार्जिन पर बेची गईं। ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक कहते हैं- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हेल्थ सेक्रेट्री ने नेशनल फार्मेस्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी को पत्र लिखा है। अस्पतालों को मरीजों से खिलवाड़ नहीं करने के निर्देश हैं। प्राइस कंट्रोलिंग सीधे हमारे हाथ में नहीं हैं। कैंसर के इलाज में घर-जमीन क्यों बिक जाती हैं? जवाब दे रही है दवा खरीद की सूची सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा...29 सितंबर को जस्टिस विक्रम नाथ व संदीप मेहता ने कहा- 2700 की कैंसर दवा पर एमआरपी 27,000 है। सारी दवाओं पर एक जैसा 16% का यूनिफॉर्म मार्जिन क्यों नहीं रखते? केंद्र सरकार का जवाब...एनपीपीए ने नॉन शूडयूल कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% कैप कर दिया। पहले 131 कैंसर दवाएं प्राइस कंट्रोल में थीं, अब 110 नई ब्रांडेड, जेनेरिक और इंपोर्टेड दवाएं भी इसमें आ गईं। ‘मार-जन’ के 2 तरीके 1. कंपनी अस्पताल संचालकों से मार्जिन तय कर दवा अस्पताल की फार्मेसी को देती है। अस्पताल के डॉक्टर्स वे ही दवाएं लिखते हैं। इससे अस्पतालों को फायदा। 2. कंपनी डॉक्टर्स से मिलती हैं। कमीशन तय करती है। दवाएं अस्पताल की फार्मेसी पर आती हैं, डॉक्टर्स ये दवाएं लिखते हैं। 3. कॉरपोरेट अस्पताल सिर्फ एडमिट पेशेंट को दवा देते हैं। बाहर के पर्चे पर दवा देने से मना कर देते हैं। {MCI व NMC रूल्स के अनुसार मरीज कहीं से भी दवा ले सकता है।