राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- शादीशुदा महिला के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप के समझौते पर दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। कोर्ट ने तथ्य छिपाने पर याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। न्यायाधीश मुन्नुरी लक्ष्मण और आशुतोष कुमार की बेंच ने एक युवक की याचिका खारिज की। उसने बीकानेर की महिला को अपनी पत्नी बताकर उसे अवैध हिरासत से छुड़ाने की मांग की थी। सुनवाई में पता चला कि महिला पहले से शादीशुदा है। उसका पति जीवित है और उनकी एक संतान भी है। याचिकाकर्ता ने लिव-इन एग्रीमेंट के आधार पर राहत मांगी थी। पहला विवाह खत्म किए बिना लिव इन को शादी का दर्जा नहीं बेंच ने कहा- पहला विवाह खत्म हुए बिना किसी अन्य के साथ लिव-इन को शादी जैसा दर्जा नहीं मिल सकता। भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 23 के तहत ऐसा एग्रीमेंट शून्य और सार्वजनिक नीति के खिलाफ है। अवैध हिरासत के सबूत न मिलने पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर 25 हजार रुपए चाइल्ड सेक्रेटेरिएट्स को चार हफ्ते में जमा कराने के आदेश दिए।