राजस्थान की बेटी और बॉलीवुड सिंगर रजनीगंधा शेखावत ने लद्दाख के लेह स्थित भारतीय सेना के कैंटोनमेंट में देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे जवानों के बीच अपनी विशेष संगीतमय प्रस्तुति देकर राजस्थानी लोकसंगीत की अनूठी छाप छोड़ी। रक्षा मंत्रालय के आमंत्रण पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में रजनीगंधा ने भारतीय सैनिकों के लिए देशभक्ति और राजस्थानी लोकगीतों की ऐसी प्रस्तुति दी, जिसने वहां मौजूद जवानों को भावुक कर दिया। लेह आर्मी कैंटोनमेंट में आयोजित इस कार्यक्रम में रजनीगंधा ने सह-गायक सागर सावरकर के साथ प्रस्तुति दी। कार्यक्रम की खास बात यह रही कि उनके साथ संगीत की संगत लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंटल सेंटर के जैज बैंड आइबेक्स थ्रिलर्स ने की। यह बैंड पूरी तरह सेना के सक्रिय जवानों से बना है, जो अपनी सैन्य सेवाओं के साथ-साथ संगीत में भी दक्ष हैं। इस अनूठे सहयोग ने कार्यक्रम को और भी यादगार बना दिया। शेखावाटी क्षेत्र से जुड़े सैनिक मिलने पहुंचे रजनीगंधा ने बताया कि यह उनके जीवन के सबसे भावुक अनुभवों में से एक रहा। लेह के फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ट्रांजिट कैंप में ठहरने और शहीद सैनिकों को समर्पित हॉल ऑफ फेम के सामने रहने के दौरान उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे वे अपने पूर्वजों और सैन्य परंपरा से एक बार फिर जुड़ गई हों। उन्होंने कहा कि बचपन से ही राजस्थान में वीरता, शौर्य और बलिदान की कहानियां सुनते हुए बड़ी हुई हैं और भारतीय सैनिकों के सामने प्रस्तुति देना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। उन्होंने मंच से सैनिकों को संबोधित करते हुए बताया कि स्कूली शिक्षा के बाद उनका भी सपना भारतीय सेना में शामिल होने का था, लेकिन उस समय महिलाओं के लिए लागू शैक्षणिक पात्रता के कारण वह ऐसा नहीं कर सकीं। उन्होंने कहा कि सेना उनके खून में बसती है, क्योंकि वह राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र के झुंझुनूं से आती हैं, जिसे देश में सबसे अधिक सैनिक देने वाले जिलों में गिना जाता है। उनके नानासा भी भारतीय सेना में रहे थे। रजनीगंधा ने जब अपने राजस्थानी गीत प्रस्तुत किए तो बड़ी संख्या में शेखावाटी क्षेत्र से जुड़े सैनिक उनसे मिलने पहुंचे। कार्यक्रम के बाद सभी ने स्थानीय शेखावाटी बोली में बातचीत की, जिसने इस मुलाकात को और भी आत्मीय बना दिया। उन्होंने कहा कि हजारों किलोमीटर दूर लद्दाख की सीमा पर अपने ही प्रदेश के सैनिकों से मिलना उनके लिए बेहद भावुक पल था। लेह की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए रजनीगंधा ने बताया कि वहां कम ऑक्सीजन और अधिक ऊंचाई के कारण शरीर को सामान्य होने में कई दिन लगते हैं। कार्यक्रम के दौरान लगातार गायन के कारण उन्होंने अपनी क्षमता से अधिक मेहनत की, जिसके कुछ घंटों बाद उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट लेना पड़ा। हालांकि उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि यह अनुभव भी उनकी यादों का खूबसूरत हिस्सा बन गया। सेना के बैंड के साथ रिहर्सल की उन्होंने बताया कि मुंबई से रवाना होने से पहले ही वह ऑनलाइन माध्यम से सेना के बैंड के साथ रिहर्सल कर रही थीं। जब पहली बार लेह में उन सैनिकों से आमने-सामने मुलाकात हुई, जिनके साथ उन्हें मंच साझा करना था, तो वह क्षण बेहद विशेष था। उनके अनुसार यह पहला अवसर था जब उन्होंने ऐसे कलाकारों के साथ प्रस्तुति दी, जो मंच पर संगीतकार और सीमा पर सैनिक दोनों की भूमिका निभाते हैं। रजनीगंधा ने कहा कि लेह में उन्होंने हर किसी को जय हिंद सर कहकर संबोधित करना सीखा और स्थानीय अभिवादन जुल्ले भी उनकी यादों का हिस्सा बन गया। उन्होंने कहा कि वह लेह में अपने दिल का एक हिस्सा छोड़कर लौटी हैं, लेकिन वहां की यादें हमेशा उनके साथ रहेंगी। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक योजना में उन्हें कारगिल में भी प्रस्तुति देने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन कठिन पहाड़ी यात्रा को लेकर वह थोड़ी आशंकित थीं। अब लेह का अनुभव लेने के बाद यदि भविष्य में फिर ऐसा अवसर मिला तो वह बिना किसी हिचक के उसे स्वीकार करेंगी।