कभी देश-विदेश के शोधार्थियों के लिए ज्ञान और शोध का प्रमुख केंद्र रहा टोंक स्थित मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फारसी शोध संस्थान आज गंभीर प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कर्मचारियों की भारी कमी, 30 वर्षों से भर्ती नियम नहीं बनने, रिक्त पदों पर नियुक्तियां ठप रहने और जर्जर होती आधारभूत सुविधाओं ने संस्थान के अकादमिक कार्यों को लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंचा दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि संस्थान में 45 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 9 कर्मचारी कार्यरत हैं। इनमें भी अकादमिक संवर्ग का केवल एक कर्मचारी बचा है, जो अगले माह सेवानिवृत्त हो जाएगा। इसके बाद संस्थान में शोध, पांडुलिपियों के अध्ययन, प्रकाशन और शोधार्थियों के मार्गदर्शन जैसे मूल कार्यों को संभालने वाला कोई भी अकादमिक अधिकारी, कर्मचारी नहीं रहेगा। लेकिन करीब तीन दशक पुराने भर्ती नियम समाप्त होने के बाद नए सेवा नियम अब तक लागू नहीं किए जा सके हैं। परिणामस्वरूप वर्षों से महत्वपूर्ण रिक्त पड़े पदों पर नियुक्तियां नहीं हो सकीं। करीब तीन माह पहले राजस्थान के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने संस्थान का निरीक्षण कर भर्ती नियमों के गठन, रिक्त पद भरने और व्यवस्थाओं में सुधार का भरोसा दिलाया था। बावजूद इसके अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है। वहीं, टोंक विधानसभा क्षेत्र से जुड़े जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता भी सवालों के घेरे में है। संस्थान की बदहाल स्थिति के बावजूद पूर्व उपमुख्यमंत्री, वर्तमान विधायक और सांसद स्तर पर भी अब तक कोई प्रभावी पहल दिखाई नहीं दी है। संस्थान की आधारभूत सुविधाएं भी लगातार बदहाल होती जा रही हैं। बारिश के दौरान मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर कीचड़ भर जाने से आगंतुकों और शोधार्थियों को परेशानी उठानी पड़ती है। वहीं भवन के कई हिस्सों में दीवारों में दरारें, छत की जर्जर स्थिति और समय पर मरम्मत नहीं होने से भवन की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। संस्थान के निदेशक भूपेंद्र कुमार यादव ने बताया कि भर्ती नियमों के गठन के लिए प्रस्ताव सरकार को भेजा जा चुका है। भवन की मरम्मत के लिए भी आवश्यक प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार स्तर पर शीघ्र निर्णय होने के बाद संस्थान की समस्याओं का समाधान संभव हो सकेगा। 50 देशों के कई शोधार्थियों का रहा है केंद्र... विश्व स्तर पर अपनी पहचान रखने वाले इस संस्थान में अब तक लगभग 50 देशों के शोधार्थी अध्ययन और शोध के लिए आते रहे हैं। यहां अरबी, फारसी, उर्दू, हिंदी, संस्कृत समेत अनेक भाषाओं के हजारों दुर्लभ ग्रंथ और पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। इनमें कई ऐसी अमूल्य पांडुलिपियां भी शामिल हैं, जो दुनिया के अन्य पुस्तकालयों में उपलब्ध नहीं हैं।