पिछले साल गुरुओं के साथ रहने का मौका मिला। इस दौरान जीवन की परेशानियों के बारे में ज्ञान हुआ। प्रवचनों से यह शिक्षा और अनुभव हुआ कि अहिंसा, करुणा, दया, जीवों की रक्षा और भगवान के मार्ग का पालन करने में ही असली सुख है। यह कहना है पाली के 30 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर शुभम श्रीश्रीमाल का। शुभम 40 लाख रुपए सालाना पैकेज की नौकरी छोड़कर संत बनेंगे। 4 सितंबर को बीकानेर में आचार्य रामलाल म.सा. एवं उपाध्याय प्रवर राजेश मुनि की निश्रा में दीक्षा ग्रहण करेंगे। मां पुष्पा श्रीश्रीमाल बेटे की बात करते हुए भावुक हो गईं। वहीं, पिता प्रदीप श्रीश्रीमाल ने मोक्ष का अर्थ समझाया। उन्होंने कहा- हर इंसान का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। मोक्ष का पहला अक्षर ‘मो’ यानी मोहनीय… मोहनीय कर्म को छोड़ने से ही मोक्ष संभव है।' हमने पहले तो बेटे को समझाया था, लेकिन बाद में मोह छोड़ना पड़ा। अब पढ़िए…. इंजीनियर से संत बनने तक का सफर 1. इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में किया बीटेक पाली शहर के बापू नगर विस्तार स्थित अमरनाथ कॉलोनी निवासी शुभम श्रीश्रीमाल (30) का जन्म 18 सितंबर 1995 को ब्यावर में हुआ था। वे प्रदीप श्रीश्रीमाल और पुष्पा श्रीश्रीमाल के बेटे हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पाली में हुई। साल 2011 में वे आगे की पढ़ाई के लिए कोटा चले गए। 2014 से 2018 तक पटियाला (पंजाब) से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक किया। बाद में उन्होंने पेटीएम, मेक माई ट्रिप जैसी कंपनियों में काम किया। वर्तमान में वे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं, जहां उनका सालाना पैकेज करीब 40 लाख रुपए है। 2. पिता का टेक्सटाइल बिजनेस, सालाना टर्नओवर 8 करोड़
शुभम के बड़े भाई अंकित के अनुसार, पिता प्रदीप श्रीश्रीमाल टेक्सटाइल बिजनेस से हैं, जिसका सालाना टर्नओवर करीब 8 करोड़ रुपए है। मां पुष्पा श्रीश्रीमाल गृहिणी हैं। परिवार में 2 ही भाई हैं। शुभम पढ़ाई के चलते अधिकतर समय घर से बाहर ही रहे। 3. 10 दिन साधु जीवन जीने के बाद आया वैराग्य
जून 2025 में शुभम ने मुमुक्षुओं के लिए आयोजित उन्नयन शिविर में भाग लिया। इस शिविर में उन्होंने 10 दिन तक साधु जीवन का अनुभव किया। इस दौरान संतों के प्रवचन सुने और संयम जीवन को करीब से समझा। शुभम ने महसूस किया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए इससे बेहतर मार्ग नहीं है। इसके बाद उनके मन में वैराग्य का भाव जागा और उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर संयम के मार्ग पर चलने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपनी इच्छा परिवार को बताई। 4. परिवार ने समय लेकर दी सहमति
शुरुआत में परिजन हैरान रह गए। उन्होंने शुभम से कहा कि इतनी पढ़ाई और अच्छी नौकरी के बाद वैराग्य का निर्णय क्यों ले रहे हैं। हालांकि, शुभम अपने फैसले पर अडिग रहे। अंकित के अनुसार, गुरुदेव से उन्हें पिछले साल नवंबर में ही परमिशन मिल गई थी, लेकिन परिवार ने कुछ समय उनके साथ बिताने के लिए आज्ञा पत्र देने में देर की। परिवार में सबसे पहले उनके पिता प्रदीप श्रीश्रीमाल ने उनके निर्णय का समर्थन किया। आखिरकार शुभम की इच्छा और खुशी को देखते हुए परिवार ने अनुमति दे दी। 5. समाज ने किया सम्मान, सितंबर में लेंगे दीक्षा
पाली के तिलक नगर स्थित समता भवन में रविवार (12 जुलाई) को श्री साधुमार्गी जैन संघ की ओर से शुभम और उनके परिवार का अभिनंदन किया गया।