अस्पतालों में बुजुर्गों को सम्मानपूर्वक इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने की पहल के लिए चिकित्सा विभाग को पुरस्कार मिलेगा। विभाग को राष्ट्रीय स्तर पर स्कॉच पुरस्कार के लिए दिल्ली आमंत्रित किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश के सबसे बड़े सवाई मानसिंह हॉस्पिटल में बुजुर्ग मरीजों को इलाज के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। इस मामले पर जिम्मेदारों का जवाब भी बड़ा चौंकाने वाला होता है। दरअसल, दौसा निवासी छोटू सिंह (74) को सांस और संक्रमण की समस्या के चलते रविवार को हॉस्पिटल की मेडिसिन यूनिट-7 में भर्ती किया। वार्ड में हालत बिगड़ने पर तीन दिन बाद मरीज को 2-डी आईसीयू में शिफ्ट किया। 4 घंटे मरीज को देखने कोई नहीं आया मरीज के बेटे रघुराज सिंह ने बताया- पिता को सांस में तकलीफ ज्यादा होने पर वेंटिलेटर सपोर्ट पर लेना था, लेकिन वेंटिलेटर खराब होने पर मरीज को एमू बैग लगाकर उसे दबाते रहने के लिए कहा। इसके बाद से तीन से चार घंटे तक मरीज को देखने कोई नहीं आया। आईसीयू में एक भी रेजिडेंट डॉक्टर मौजूद नहीं रहा। केवल ट्रेनी डॉक्टर वहां मौजूद थे, जिनसे बात करने पर वे भी ठीक से जवाब नहीं दे पा रहे थे। यूनिट हेड बोले, डॉक्टर नहीं इसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं इस मामले पर जब यूनिट हेड डॉ. आर.के. भीमवाल ने कहा कि वार्ड में डॉक्टर नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी मेरी नहीं है, इसके लिए हॉस्पिटल अधीक्षक से बात करें। यूनिट हेड ने कहा, आईसीयू कक्ष के प्रशिक्षु चिकित्सक उनकी जिम्मेदारी में नहीं आते। ऐसे में सवाल यह है कि जब आईसीयू कक्ष में भर्ती गंभीर मरीज को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो, तब जिम्मेदारी किसकी होगी? आखिर कहां रहते हैं सीनियर रेजिडेंट सवाल ये है कि हर यूनिट में मेडिकल कॉलेज की तरफ से ​जूनियर और सीनियर रेजिडेंट नियुक्त किए जाते हैं। इनको बकायदा सरकार की तरफ से स्टाइपेंड (अच्छा वेतन) भी मिलता है, लेकिन उसके बावजूद सीनियर रेजीडेंट वार्डों में 8 घंटे की भी ड्यूटी नहीं दे रहे। इसके कारण सबसे ज्यादा परेशानी मरीजों को उठानी पड़ती है। इसके लिए हॉस्पिटल प्रशासन और मेडिकल कॉलेज प्रशासन की तरफ से क्यों निगरानी नहीं रखी जाती?