सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हिरासत के बाद कोर्ट में पेश करने की 24 घंटे की समय सीमा को साफ किया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा उसे हिरासत में लेते ही शुरू हो जाएगी। यह समय औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं गिना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में लेकर बाद में उसकी गिरफ्तारी दर्ज करने का रास्ता नहीं अपना सकतीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला गिरफ्तार त्रिपुरा के चार लोगों की याचिका से जुड़ा है। इनका आरोप है कि हिरासत में लेने और गिरफ्तारी दर्ज करने के बीच करीब 21 घंटे का अंतर था। मामले की सुनवाई जस्टिस उज्जवल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की बेंच में हुई। सवाल-जवाब में जानें 24 घंटे में पेश करने के नए नियम सवाल-1: अभी तक क्या होता है? जवाब: पुलिस संदिग्ध को हिरासत में रखकर जब तक चाहे पूछताछ करती है। एफआईआर दर्ज होने पर उसमें जो समय लिखा होता है उसके आधार पर ही 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करती है। सवाल-2: अब क्या होगा? जवाब: अब हिरासत के समय से 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करना होगा। सवाल-3: किसी व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने के मायने क्या हैं। क्या पुलिस किसी को अपने साथ ले जाए तो उसे ही हिरासत मान लिया जाता है? जवाब: जब व्यक्ति अपनी मर्जी से कहीं नहीं जा सकता और पुलिस या अदालत के नियंत्रण में होता है, तो वह हिरासत में माना जाता है। हर गिरफ्तारी में हिरासत होती है, लेकिन हर हिरासत गिरफ्तारी नहीं होती। सवाल-4: हिरासत में लेने का समय कैसे तय होगा? जवाब: लाइव लॉ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पुलिस गिरफ्तारी मेमो और केस डायरी में अपना दर्ज समय बताएगी। लेकिन मजिस्ट्रेट को उसकी जांच करनी होगी। जरूरत पड़ने पर CCTV और दूसरे सबूत भी देखे जा सकते हैं। सवाल-5: हिरासत में लेने और औपचारिक गिरफ्तारी में क्या अंतर है? जवाब: इसे एक उदाहरण से समझिए। त्रिपुरा हाईकोर्ट ने आरोपियों की याचिका खारिज की थी मामला त्रिपुरा में 11.03 किलो याबा टैबलेट की जब्ती से जुड़ा था। 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान चारों लोगों को हिरासत में लिया गया, लेकिन पुलिस ने उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दर्ज की। मतलब हिरासत में लेने और गिरफ्तारी दर्ज करने के बीच करीब 21 घंटे का अंतर था। आरोपियों का कहना था कि उन्हें हिरासत में लेने के 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था। मामला त्रिपुरा हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। हिरासत या गिरफ्तारी में आपके अधिकार क्या हैं? 24 घंटे का नियम: अनुच्छेद 22 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। गिरफ्तारी का कारण जानने का हक: सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में देने होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने पिछले महीने कहा कि अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करने वाली गिरफ्तारी असंवैधानिक होगी। वकील का अधिकार: अपनी पसंद के वकील से मिलने और उसकी मदद लेने का हक है। वकील का खर्च न उठा सकें, तो मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है। BNSS की धारा 38 में पूछताछ के दौरान वकील से मिलने की बात है, लेकिन पूरी पूछताछ के दौरान साथ रहने की नहीं। महिलाओं के लिए खास प्रावधान: BNSS की धारा 43(5) के मुताबिक महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अपवाद में इसके लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति चाहिए। डीके बसु गाइडलाइंस (1997): ये गिरफ्तारी या हिरासत दोनों पर लागू हैं। पुलिसकर्मी का नेम टैग साफ दिखना चाहिए। एक गवाह की मौजूदगी में अरेस्ट मेमो बनना चाहिए। चोटें दर्ज होनी चाहिए और परिवार को सूचना दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि ये सिर्फ सुझाव नहीं हैं। पालन न करने पर विभागीय कार्रवाई या अवमानना का मामला भी बन सकता है। -------------------------------- यह खबर भी पढ़ें… बीजेपी बोली- CJP नेताओं को देश-विदेश से फंडिंग मिल रही, पाकिस्तानी नेता आशुतोष रांका को पैसे दे रहे केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि अधिकारियों के पास कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके और आशुतोष रांका को विदेशी फंडिंग मिलने के सबूत हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिजीत को अमेरिका के दानदाताओं से, जबकि आशुतोष को पाकिस्तानी नेताओं से पैसे मिल रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…