पंचायत चुनाव के तीसरे चरण में कांग्रेस व भाजपा ने फिर बड़े नेताओं के परिवारों पर दांव खेला है। जिला परिषद व पंचायत समितियों में बहुमत हासिल करने के लिए पार्टी के विधायकों व वरिष्ठ नेताओं की पत्नी, बेटे व बहू को मैदान में उतारा है। भाजपा-कांग्रेस के कई नेताओं ने अपने परिवार के दो-तीन सदस्यों को टिकट दिलवा कर अपना राजनीतिक कद को बढ़ा लिया है। चूरू जिला परिषद के वार्ड- 39 से भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ का बेटा पराक्रम राठौड़ और कांग्रेस ने पूर्व विधायक भंवरलाल शर्मा के बेटे और सरदारशहर विधायक अनिल शर्मा के भाई केशरीचंद शर्मा आमने-सामने है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष व पूर्व मंत्री के बेटा-बहू मैदान में : पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ के बेटे पराक्रम राठौड़ व बहू कनिका राठौड़ चूरू जिला परिषद में भाजपा प्रत्याशी है। वहीं पूर्व कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी के बेटे मनीष सैनी ने टोंक जिला परिषद वार्ड नंबर 20 से नामांकन भरा है। निर्दलीय विधायक चंद्रभान सिंह आक्या की पत्नी सुशीला कंवर को भाजपा ने चित्तौड़गढ़ में जिला परिषद के वार्ड 16 से टिकट दिया है। भाजपा ने आगरा छावनी के पूर्व विधायक गुटयारी लाल दुवेश की बेटी पूजा दुवेश को भरतपुर जिला परिषद वार्ड 22 से मैदान में उतारा है। वहीं वार्ड-18 से बयाना के पूर्व विधायक बच्चू बंशीवाल की बेटी कनिका सिंह चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस ने भी नेता परिवारों को बांटे टिकट कांग्रेस ने विधायक नरेंद्र बुडानिया की पत्नी कनक देवी को चूरू जिला परिषद के वार्ड 38 में प्रत्याशी बनाया है। यहां वार्ड- 39 से कांग्रेस ने पूर्व विधायक भंवरलाल शर्मा के बेटे और सरदारशहर विधायक अनिल शर्मा के भाई केशरीचंद शर्मा को टिकट दिया। पूर्व विधायक की बहू अंजूबाला को भी टिकट दिया है। टोंक में कांग्रेस की ओर से पूर्व डिप्टी सीएम बनवारी लाल बैरवा की बेटी अलका बैरवा ने जिला परिषद सदस्य के लिए नामांकन दाखिल किया। निवाई से पूर्व विधायक प्रशांत बैरवा की पत्नी सुषमा बैरवा ने भी कांग्रेस की ओर से नामांकन दाखिल किया। टोंक जिला प्रमुख का पद अनुसूचित जाति (एससी) की महिला के लिए आरक्षित है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी व विधायक सुशीला डूडी की पुत्रवधू निकिता डूडी बीकानेर जिला परिषद से चुनाव लड़ रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री महादेव सिंह खंडेला की पत्नी पार्वती देवी भी खंडेला पंचायत समिति से चुनावी मैदान में है। पंचायत चुनाव में परिवारों पर दांव क्यों? बहुमत की लड़ाई: जिला परिषद और पंचायत समितियों में बहुमत हासिल करने के लिए पार्टियां स्थानीय स्तर पर मजबूत माने जाने वाले राजनीतिक परिवारों को टिकट दे रही हैं।
पहचान और संगठन का सहारा: बड़े नेताओं के परिवारों को क्षेत्र में पहले से बनी राजनीतिक पहचान और समर्थकों के नेटवर्क का फायदा मिल सकता है। हालांकि, इससे चुनाव में जीत की गारंटी नहीं होती।
परिवारवाद पर बहस: एक ओर राजनीतिक परिवारों को टिकट देने से उनके समर्थकों को प्रतिनिधित्व का मौका मिलता है, वहीं दूसरी ओर इससे नए कार्यकर्ताओं और दूसरे दावेदारों के अवसरों को लेकर सवाल भी उठते हैं।