भारतीय रिसर्चर्स को ई-मेल भेजकर झांसा दे रहा है चीन चीन अब भारत के रिसर्च सिस्टम में सेंध लगा रहा है। सीमा और बाजार के बाद अब वह भारतीय शोधकर्ताओं को पैसों का लालच देकर अपने जाल में फंसा रहा है। भास्कर की पड़ताल में यह खुलासा हुआ है कि चीन एक ‘साइटेशन कार्टेल’ चला रहा है। इसके तहत भारतीय रिसर्चर्स और नए प्रोफेसर्स को ई-मेल भेजकर रिसर्च में सहयोग करने का झांसा दिया जाता है। इसके बाद उन्हें पैसे देकर अपनी रिसर्च में चीन के उन पेपर्स को जोड़ने (साइट करने) के लिए कहा जाता है, जिनका उस विषय से कोई लेना-देना नहीं होता है। चीन ऐसा सिर्फ इसलिए कर रहा है ताकि ग्लोबल रैंकिंग में उसकी यूनिवर्सिटीज और रिसर्चर्स का नाम ऊपर आ सके। इस साजिश का पर्दाफाश करने के लिए भास्कर के रिपोर्टर ने रिसर्च कंसल्टेंट बनकर चीन की ‘साइंस एक्सप्लोर’ एजेंसी से संपर्क किया। जब रिपोर्टर ने अपने पास 350 से ज्यादा रिसर्चर्स की टीम होने का दावा किया, तो चीनी एजेंसी ने बात करने के लिए एक प्राइवेट एजेंट तैनात कर दिया। ‘बारबरा’ नाम के इस एजेंट ने वॉट्सएप नंबर +86 16638955380 से चैटिंग शुरू की। यह पुख्ता करने के बाद कि उसकी बात एक रिसर्च कंसल्टेंट से ही हो रही है, उसने साइटेशन की प्रक्रिया समझाई और इसके बदले पैसों की पेशकश की। एजेंट ने सिर्फ एक ही शर्त रखी कि उनके रेफरेंस को साइट करने वाली रिसर्च किसी प्रतिष्ठित इंडेक्सड जर्नल में छपनी चाहिए। इसके लिए तीन महीने का समय दिया जाएगा। वो सबकुछ, जो आपके लिए जानना जरूरी
भास्कर रिपोर्टर ने चीनी एजेंसी से की डील, एजेंट बोला- सीक्रेट रखना, ज्यादा पैसे दूंगा
रिपोर्टर: मेरे पास 350 से ज्यादा रिसर्च स्कॉलर्स और प्रोफेसर्स की टीम है।
चीनी एजेंट: इनके रिसर्च पेपर्स का टाइटल, कीवर्ड्स और जर्नल का नाम भेजना होगा। मैं उन पेपर्स की लिस्ट भेजूंगा, जिन्हें साइट (यानी जिनका रेफरेंस देना है) करना है।
रिपोर्टर: जर्नल कौन-सा होना चाहिए? हमें इसके लिए कुल कितना टाइम मिलेगा?
चीनी एजेंट: जर्नल SCI, SCIE, SSCI या AHCI इंडेक्स्ड होना चाहिए। इनमें आर्टिकल या रिव्यू के लिए 3 महीने मिलेंगे।
रिपोर्टर: एक साइटेशन के कितने पैसे देंगे?
चीनी एजेंट: हम एक साइटेशन के 80 RMB (करीब 1,134 रु.) देते हैं। डील सीक्रेट रखने पर हम 100 RMB (1,150 रुपए) दे देंगे।
रिपोर्टर: एक पेपर में कम से कम कितने साइटेशन किए जा सकते हैं?
चीनी एजेंट: कम से कम 10 तो करने होंगे। आगे आपकी मर्जी है कि आप कितने करते हैं। पेपर छपने के बाद आपका पेमेंट होगा।
रिपोर्टर: आप तो चीन में हैं, पैसे कैसे देंगे?
चीनी एजेंट: आप जैसे चाहेंगे, वैसे आपको पेमेंट कर देंगे। भारतीय बैंक, पेटीएम, फोनपे, पेपल या क्रिप्टोकरेंसी में भी पेमेंट कर देंगे। दोहरा नुकसान…; चीन की रैंकिंग सुधर रही, हमारी रिसर्च का स्तर गिर रहा है
भारत और कई दूसरे देशों के पेपर्स में डाले गए फर्जी साइटेशंस से चीन के रिसर्चर्स का एकडेमिक प्रोफाइल आर्टिफिशियल तरीके से बढ़ रहा है। इससे ग्लोबल रैंकिंग्स में चीन का दबदबा उसकी वास्तविक वैज्ञानिक क्षमता से कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देता है। इसके जरिए ड्रैगन दुनिया को दिखाना चाहता है कि उसकी रिसर्च सबसे ज्यादा पढ़ी और मानी जा रही है। जबकि हकीकत में ऐसा है नहीं। वहीं, फर्जी चीनी साइटेशन से हमारे रिसर्च का स्तर गिर रहा है। अच्छे जर्नल इसके बारे में पता चलते ही ऐसा करने वालों को ब्लैकलिस्ट कर देंगे।'- प्रोफेसर सोमेश माथुर, आईआईटी कानपुर बड़ा खतरा 10 साल में 5 गुना बढ़ा, 2015 में सिर्फ 2% था, अब 10% भारत की रिसर्च में चीन की इस घुसपैठ को उजागर करने के लिए भास्कर ने देश में पिछले 10 साल में हुई रिसर्च का डेटा खंगाला। 2015 में भारतीय रिसर्चर्स के कुल 1,68,900 पेपर प्रकाशित हुए थे। इनमें से केवल 3,379 पेपर्स ऐसे थे, जिनमें संदिग्ध या बिना संदर्भ वाले चीनी पेपर्स का साइटेशन था। यानी फर्जी साइटेशन की दर मात्र 2% थी। 2021 तक यह आंकड़ा इसी के इर्द-गिर्द रहा, लेकिन इसके बाद से इसमें लगातार इजाफा हो रहा है। 2025 में 4,97,600 रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए, जिनमें से 49,760 में फर्जी चीनी साइटेशन थे। यानी अब भारत के 10% रिसर्च पेपर्स इस चीनी कार्टेल के प्रभाव में आ चुके हैं। चंद पैसों के लालच में हो रही यह धांधली हमारे देश की शिक्षा और रिसर्च व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है।