राजसमंद | जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण की मंगल सन्निधि में ज्ञानशाला दिवस मनाया। सुधर्मा सभा में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों से आए ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने भावपूर्ण प्रस्तुतियां दीं। श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हुए। महाश्रमण ने ज्ञानार्थियों को आशीर्वाद दिया। ज्ञानशाला को बच्चों के संस्कार निर्माण और ज्ञानवर्धन का महत्वपूर्ण उपक्रम बताया। महाश्रमण ने आगमवाणी के माध्यम से कहा, ज्ञान को कंठस्थ करना भी तपस्या है। इसके लिए समय चाहिए। एकाग्रता चाहिए। परिश्रम चाहिए। ज्ञान स्मृति में सुरक्षित हो जाए तो वह व्यक्ति की ज्ञान-संपत्ति बन जाता है। जरूरत पड़ने पर जैसे गृहस्थ संचित धन का उपयोग करता है, वैसे ही कंठस्थ ज्ञान भी काम आता है। उन्होंने कहा, विहार के दौरान गांव में लोग मिल जाएं। किसी को ज्ञान की बात बतानी हो। कंठस्थ गीत, भजन, श्लोक, दोहे से बिना किताब या डायरी के भी प्रभावी ढंग से बात कही जा सकती है। आगम की बातें और श्लोक कंठस्थ हों तो व्यक्ति लंबे समय तक बिना देखे भी उनका व्याख्यान कर सकता है। महाश्रमण ने कहा, कंठस्थ ज्ञान की देखभाल जरूरी है। इसके लिए परावर्तना यानी चिंतन जरूरी है। पुनरावृत्ति जरूरी है। बार-बार चितारने से विस्मृत ज्ञान फिर स्मृति में आ जाता है। स्मरण शक्ति मजबूत होती है। कंठस्थ ज्ञान को मजबूत रखने के लिए निरंतर पुनरावर्तन करते रहना चाहिए। मंगल प्रवचन के अंत में महाश्रमण ने साधु, साध्वियों, समणियों, मुमुक्षुओं को संकल्प कराया। आगामी तीन वर्षों तक शीतकाल के चार महीनों में 500 गाथाओं का स्वाध्याय करना है। 500 गाथाओं को चितारना है। कार्यक्रम में मुमुक्षु जहान बेताला और मुमुक्षु दिव्या ने दीक्षा देने की प्रार्थना की। महाश्रमण ने घोषणा की। 18 जनवरी 2027 को दीक्षा समारोह होगा। दोनों को मुनि या साध्वी दीक्षा दी जाएगी। घोषणा के बाद सुधर्मा सभा में जयघोष हुआ। जहान बेताला के पुत्र प्रवीण बेताला ने भी भावाभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला दिवस कार्यक्रम में योगक्षेम प्रवास व्यवस्था समिति, लाडनूं के अध्यक्ष प्रमोद बैद ने अभिव्यक्ति दी। सुजानगढ़ ज्ञानशाला के संयोजक संजय बोथरा ने भी बात रखी। इसके बाद लाडनूं, राजलदेसर, छापर, बीदासर, छोटी खाटू, कालू की ज्ञानशालाओं के ज्ञानार्थियों ने प्रस्तुतियां दीं। महाश्रमण ने कहा, भाद्रव महीने का पहला रविवार ज्ञानशाला दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर कई स्थानों से ज्ञानार्थी पहुंचे। ज्ञानशाला बच्चों के संस्कार निर्माण और ज्ञानवर्धन के लिए उपयोगी है। महासभा और क्षेत्रीय सभाओं के तत्वावधान में ज्ञानशाला का यह पौधा निरंतर विकसित होता रहे। उन्होंने कहा, बच्चों के जीवन में मोबाइल फोन, टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया का असर बढ़ रहा है। भौतिकता के साथ आध्यात्मिकता का संतुलन जरूरी है। केवल भौतिकता से जीवन में कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। ज्ञानशाला के जरिए बच्चों में आध्यात्मिकता और संस्कारों का विकास होता रहे। यह जरूरी है।