नगर निगम चुनाव में भाग्य आजमा रहे सभी प्रत्याशियों की किस्मत शुक्रवार को ईवीएम में बंद हो जाएगी और अगले पांच साल तक यही जीते हुए प्रत्याशी शहर के विकास का काम करेंगे। लेकिन, अगर सही प्रत्याशी नहीं जीता तो पूरे पांच साल तक शहर की जनता को पछताना होगा। इसके लिए जरूरी है कि लोग घरों से निकलें और अपनी पसंद व काबिल प्रत्याशी को चुनें। शहर में इसी वोटिंग पैटर्न की नब्ज टटोलने के लिए भास्कर ने पिछले 4 चुनावों की वोटिंग की पड़ताल की तो बहुत ज्यादा उत्साहजनक परिणाम नहीं निकले। ऐसा लगता है कि शहर की जनता अपने मताधिकार को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर नहीं है। 2004 से लेकर 2019 के वोटिंग का पैटर्न बताता है कि यहां सबसे ज्यादा वोटिंग 2014 में हुई थी। तब 64 प्रतिशत वोटर्स ने अपने वोट डाले थे, जबकि उस समय पूरे प्रदेश में 67.90 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले थे। आमतौर पर यह धारणा रहती है कि समय के साथ लोग जागरूक होते हैं, लेकिन जब 2019 का नगर निगम चुनाव हुआ तो शहर की जनता फिर घरों में बैठ गई। सिर्फ 57.81 प्रतिशत वोटिंग हुई। यह पूरे प्रदेश में सबसे कम थी, जबकि प्रदेश में टोटल वोटिंग 71.57 प्रतिशत हुई थी। इस तरह हम प्रदेश की औसत वोटिंग से लगातार पीछे रहे हैं। चूंकि इस बार कांग्रेस और भाजपा में कांटे की टक्कर बताई जा रही है, ऐसे में उम्मीद है कि इस बार लोग घरों से बाहर निकलेंगे और अपना रिकॉर्ड सुधारते हुए अपने एक वोट से शहर का भाग्य तय करेंगे।
वोटिंग जरूरी क्यों? सही प्रत्याशी नहीं जीता तो 5 साल पछताना होगा इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। एसआईआर के बाद मतदाता सूची अधिक अपडेटेड होने और निर्वाचन विभाग व राजनीतिक दलों की सक्रियता से मतदाताओं के बूथ तक पहुंचने की संभावना बढ़ी है। सोशल मीडिया कैंपेन ने भी मतदान को लेकर माहौल बनाया है। भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर के कारण दोनों दलों के प्रत्याशी और कार्यकर्ता अंतिम समय तक मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने में जुटे हैं। इस बीच मौसम भी मतदाताओं के अनुकूल है। पिछले कुछ दिनों से आसमान में बादल छाए हुए हैं। शुक्रवार को भी मौसम खुशनुमा रहा तो लोगों के घरों से निकलकर मतदान केंद्रों तक पहुंचने की संभावना और बढ़ जाएगी। 2019 में 49 निकायों में फिसड्डी रहे
साल 2019 में प्रदेश के उदयपुर सहित 49 शहरी निकायों में चुनाव हुए थे। इनमें तब टोटल 71.57% वोटिंग हुई थी। इसमें सबसे खराब प्रदर्शन उदयपुर का था। यहां मात्र 57.81% वोटिंग हुई थी, वहीं अजमेर के नसीराबाद पालिका क्षेत्र में 91%, बारां के मांगरोल में 87.96%, भरतपुर के रूपवास 87.69% वोटिंग हुई थी। राज्य में जिसकी सरकार, उसका रहता है दबदबा, ऐसे समझिए 2014 और 2019 के चुनाव में पार्टीवाइज मिले वोटों की पड़ताल में सामने आया कि राज्य में जिसकी सरकार, उसको भर-भर के वोट मिले, लेकिन सरकार जाते ही पार्टी से वोटर छिटक गए। सबसे ज्यादा वोटों का अंतर चित्तौड़गढ़, राजसमंद और बांसवाड़ा में देखने को मिला। 2019 के चुनाव में चित्तौड़गढ़ के निंबाहेड़ा में कांग्रेस को 55.92 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि भाजपा को 38.65 प्रतिशत वोट मिले। यहीं पर 2014 में जब राज्य में भाजपा की सरकार थी तब भाजपा 51.20 प्रतिशत वोट मिले थे और कांग्रेस को 38.71 प्रतिशत वोट मिले। इसी तरह राजसमंद के आमेट नगर पालिका में 2019 में कांग्रेस को 56.97 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 41.23 प्रतिशत वोट मिले। जैसे ही सरकार बदली भाजपा का वोट प्रतिशत भी बढ़ गया। 2014 में यहां भाजपा ने 60 प्रतिशत से ज्यादा वोट प्राप्त किए, जबकि कांग्रेस 37.94 प्रतिशत पर आ गई। हालांकि उदयपुर इससे अछूता रहा है। 2019 में भाजपा का वोटिंग प्रतिशत गिरा जरूर, लेकिन बोर्ड उसी का बना।