तीन साल से अनुमति का इंतजार कर रहे फार्मासिस्ट भर्ती 2023 के अभ्यर्थियों के दस्तावेज सत्यापन के दौरान हंगामा हो गया। कोर्ट के आदेश पर होल्ड पर चले रहे 60 अभ्यर्थी बुधवार को जब राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान (सीफू) में सत्यापन को पहुंचे तो चिकित्सा विभाग के अधिकारियों ने पेपर-कॉपी देकर परीक्षा में बैठा दिया। अभ्यर्थी भौचक रह गए, विरोध किया, लेकिन अधिकारी नहीं माने। छोटे बच्चे और परिजनों के साथ आए कुछ अभ्यर्थियों ने अधिकारियों के पैर पकड़े तो कुछ ने हाथ जोड़े। महिलाओं की आंखों में तो आंसू तक आ गए। लेकिन अधिकारी नहीं माने। इन्होंने आरोप लगाए के ये वे ही अधिकारी हैं, जो हमें सरकारी फार्मासिस्ट नहीं बनने दे रहे और दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर कर रहे हैं। बच्चों के साथ आए परिजनों ने अधिकारियों से कहा कि साहब हमारे बच्चों की नौकरी लग जाने दो, हम हाथ जोड़कर विनम्र प्रार्थना करते हैं। देर शाम तक अभ्यर्थी चिकित्सा विभाग के अधिकारियों का विरोध करते रहे। वहीं अधिकारियों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि हमने तो स्क्रीनिंग की है। अभ्यर्थियों का सवाल- कोर्ट ने सत्यापन को कहा, परीक्षा किस आधार पर? अभ्यर्थियों का आरोप था कि उन्हें दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाया गया था, लेकिन वहां पहुंचने पर परीक्षा की प्रक्रिया शुरू कर दी। उनका सवाल था कि जब कोर्ट के आदेश पर दस्तावेज सत्यापन होना था तो फिर परीक्षा किस आधार पर कराई गई? अभ्यर्थियों ने अधिकारियों से प्रक्रिया स्पष्ट करने और भर्ती में न्याय दिलाने की मांग की। 3067 पदों की भर्ती; 2800 जॉइनिंग, 60 का मामला अब भी अटका चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने वर्ष 2023 में फार्मासिस्ट के 3067 पदों पर भर्ती निकाली थी। इनमें से करीब 2800 अभ्यर्थी जॉइनिंग कर चुके हैं, जबकि संदिग्ध मानते हुए 60 को होल्ड पर रखा गया था। मामला कोर्ट में पहुंचने के बाद 28 अक्टूबर को इन अभ्यर्थियों को सीफू में दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाया गया था। जिम्मेदार सवालों से बचते रहे, बोले- हमने तो स्क्रीनिंग की है झालाना स्थित सीफू ऑफिस में ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक और संयुक्त निदेशक डॉ. संजय सक्सेना इस मामले में कुछ भी कहने से बचते नजर आए। वे सिर्फ यह कहते रहे कि हमने तो स्क्रीनिंग की है। हम उपाधियों की सत्यता की जांच कर रहे हैं। जो परीक्षा ली है इसके आधार पर कोई मेरिट नहीं बनेगी। अभ्यर्थियों में इसको लेकर सिर्फ कंफ्यूजन है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। -राकेश शर्मा, निदेशक, अराजपत्रित चिकित्सा विभाग