दौसा में नसबंदी ऑपरेशन फेल होने के मामले में स्थाई लोक अदालत ने पीड़िता के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़िता को कुल 80 हजार रुपए की क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिए हैं। इसमें मधुर अस्पताल, बांदीकुई को मानसिक और शारीरिक नुकसान के लिए 50 हजार रुपए तथा सीएमएचओ ऑफिस को परिवार नियोजन इन्डिमिनिटी योजना के तहत 30 हजार रुपए देने होंगे। पूरी रकम 15 दिन में पीड़िता को देने के निर्देश दिए गए हैं। 2021 में नसबंदी कराई, 2024 में बेटे को जन्म दिया मामला 2024 का रामगल्ला बनाम मधुर अस्पताल व अन्य से जुड़ा है। मामले के अनुसार पीड़िता के पहले से तीन बच्चे थे। उसने 8 अप्रैल 2021 को मधुर अस्पताल, बांदीकुई में नसबंदी का ऑपरेशन कराया था। इसके बावजूद नसबंदी सफल नहीं हुई और महिला गर्भवती हो गई। इसके बाद 29 मई 2024 को उसने एक बेटे को जन्म दिया। पीड़िता ने इस मामले में स्थाई लोक अदालत दौसा में परिवाद पेश किया। उसने बच्चे के पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई, शादी और जीवनभर होने वाले खर्च की भरपाई की मांग की थी। अस्पताल ने डॉक्टर को जिम्मेदार नहीं माना मामले में अस्पताल और दूसरे पक्षों की ओर से नसबंदी ऑपरेशन के फेल होने की संभावना का तर्क दिया गया। उनका कहना था कि ऑपरेशन फेल होने की संभावना रहती है, इसलिए डॉक्टर और अस्पताल को इसके लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। यह भी दलील दी गई कि जब पीड़िता को गर्भवती होने की जानकारी मिली थी, तब वह गर्भपात करा सकती थी। महिला को गर्भपात के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता स्थाई लोक अदालत ने मामले के दस्तावेजों, सबूतों, दोनों पक्षों की दलीलों और पहले दिए गए अदालती फैसलों को देखा। इसके बाद अदालत ने माना कि नसबंदी ऑपरेशन डॉक्टर की लापरवाही के कारण फेल हुआ। अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी महिला को गर्भपात कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि नसबंदी फेल होने के कारण पीड़िता को मानसिक और शारीरिक नुकसान हुआ है। इसी आधार पर स्थाई लोक अदालत के पूर्णकालिक अध्यक्ष राजेश चंद्र गुप्ता और सदस्य सुरेश कुमार गोयल तथा पूनम शर्मा ने फैसला सुनाया। 15 दिन में देनी होगी 80 हजार रुपए की रकम फैसले के अनुसार मधुर अस्पताल, बांदीकुई को मानसिक और शारीरिक नुकसान के लिए 50 हजार रुपए देने होंगे। वहीं सीएमएचओ ऑफिस को परिवार नियोजन इन्डिमिनिटी योजना के तहत 30 हजार रुपए देने होंगे। इस तरह पीड़िता को कुल 80 हजार रुपए की रकम मिलेगी। अदालत ने दोनों रकम 15 दिन के अंदर पीड़िता को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।